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चाय उद्योग की सुनो पुकार-वरना होगा बंटाधार-(2) — आनंद शास्त्री

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सम्माननीय मित्रों ! आप सभी को स्मरण दिला दूं कि सन् 1951 में चाय उद्योग के हितार्थ असमिया सरकार ने-“चालिहा कमेटी”
का गठन किया था धीरे-धीरे उसके सुझावों पर सरकार ने ध्यान भी दिया ! किन्तु इस बिन्दु पर यह भी उल्लेखनीय है कि ब्रम्हपूत्र बेली की अपेक्षा बराक उपत्यका के चायबागानों की समस्याओं पर कम ध्यान देने के कारण यहाँ की परिस्थितियाँ धीरे-धीरे और भी खराब होती गयीं। वैसे ये सत्य है कि यहाँ एक्साइज ड्यूटी, भू राजस्व ब्रम्हपूत्र वेली की अपेक्षा कम है किन्तु आय अत्यंत ही कम है यहाँ ग्रीन टी कम होती है क्योंकि चाय पाता अच्छे स्तर की नहीं है। 
यहाँ चाय बागान क्षेत्र के विकास पर व्यय की अत्यधिक आवश्यकता है ! इस संदर्भ में प्रधानमंत्री सडक योजना के अंतर्गत अनेक योजनाएं बनीं किन्तु उनमें अधिकांशतः कार्यान्वित नहीं हुयीं इस विषय पर पर बागानों में सडकें बनाने हेतु 1-1 करोड़ मिलने का आश्वासन सरकार ने दिया था जिसमें ती प्रतिशत के लगभग कार्य हुवा अर्थात सभी बागानों को लाभ  नहीं मिला और मिला भी तो उस धन का उपयोग नहीं हुवा जिसका व्यय असम सरकार को यहाँ के विकास पर करना था इस हेतु सन् 2017 में तद्कालीन असम के राज्यपाल बनवारी लाल पुरोहित जी के सिल्चर आगमन पर उनको ज्ञापन भी दिया गया था किन्तु दुर्भाग्य से इस संदर्भ में अभीतक कुछ नहीं हो पाया। फिर भी बहुत सारी कच्ची सडकों को बागान प्रबंधन ने अपने व्यय पर बनवाया ! जिन्होंने बनवाया उन चाय बागानों का आज धीरे-धीरे विकास भी होता जा है किन्तु अधिकांश बागानों की आर्थिक स्थिति अत्यंत ही दयनीय होने के कारण वे धीरे-धीरे नष्ट होने के कगार पर आ चुके ! वैसे जमीनी सच्चाई ये भी है कि चाय बागान श्रमिकों को जल विपणन,प्रधानमंत्री आवास एवं  शौचालय भी मिलते जा रहे हैं अर्थात विकास तो हुवा किन्तु बागान उद्योग के विकास के अभाव में यह सबकुछ व्यर्थ है।
मित्रों ! हमारे प्रधानमंत्री जी एवं मुख्यमंत्री जी को जब भी मैं सुनता हूँ ! उनके ट्वीट पढता हूँ ! किसी भी कार्यक्रम में उनकी प्रतिभा तथा प्रेरणादायक वक्तव्य को सुनता हूँ जहाँ वे कहते हैं कि-“सबका साथ सबका विकास” तो आश्वस्त हो जाता हूँ कि ऐसा उन्होंने किया है ! कर रहे हैं! करते रहेंगे ! समाज की बिलकुल पिछली कतार में सदियों से आस लगाये बैठों का उद्धार वे करेंगे ! किन्तु वे दिल्ली और दिसपुर में हैं ! उनका आगमन सिल्चर और कुछेक आसपास के क्षेत्रों तक ही होना सम्भव हो पाता है और वह भी हमारे जनप्रतिनिधियों की जागरूकता से हो पाता है। और हमारे चाय बागान,प्रबंधन एवं चाय श्रमिक ऐसे सुदूर क्षेत्रों में हैं जिन कईयों में अभी भी आने-जाने की सुविधा-असुविधा पर चर्चा करना व्यर्थ है।
मुझे भलीभांति स्मरण है कि आज से पच्चीस तीस वर्षों पूर्व तक चायपत्ति के विभिन्न सस्ती ब्रान्डों के आकर्षक पैकेट दो-तीन सौ रुपये प्रति किलो की दर से मिलते थे ! वो आज भी मिलते हैं ! वे अब लगभग तीन चार सौ में ही मिलते हैं ! और ये सस्ता चाय पाता निःसंदेह बराक उपत्यका का होता है क्योंकि इसकी गुणवत्ता अभीतक इसी मूल्य के ही योग्य है।
किन्तु इनके उत्पादन की लागत जितनी तीस वर्ष पूर्व थी उससे चार गुनी बढ चुकी ! इनमें प्रयुक्त कृषी संयन्त्र,सिंचाई हेतु जल विपणन,नाना प्रकार के उर्वरक तथा कीटनाशकों के मूल्य बेतहाशा बढते गये ! इनकी पैकेजिंग,परिवहन आदि के मूल्य कम से कम चार गुना तक बढ गये! अर्थात इनकी मूल्य वृद्धि 35% से अधिक नहीं हो पायी किन्तु लागत 300% तक बढ चुकी। जिसके कारण यहाँ चायबागानों की ऐसी स्थिति हो चुकी कि उत्पादन बढाने के लिये इनको येन केन प्रकारेण पत्तों को मुट्ठी भरकर काटना पडता है।
यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि भारतवर्ष में अकुशल श्रमिकों का न्यूनतम पारिश्रमिक 6950₹ मासिक अथवा 232₹ दैनिक निर्धारित है तद्नुसार चाय बागान श्रमिकों को 250₹ से 228₹ प्रति 8 घण्टे की दर से असम सरकार ने निर्धारित किया है जो कि बिलकुल ही उचित है ! इसमें किसी भी प्रकार के किन्तु परन्तु की आवश्यकता नहीं है ! और यह विचारणीय है कि बागानों में उत्पादन कम होता गया,गुणवत्ता गिरती गयी,चाय पाता का मूल्य 300-400₹ से आगे नहीं गया और इसकी अपेक्षा पारिश्रमिक में 110₹ से 118₹ तक की वृद्धि कर दी गयी ये बिलकुल ही उचित है किन्तु न्यायोचित नहीं है ! यदि सरकार बराक उपत्यका के इस बीमार उद्योग को जीवनदान देना चाहती है तो इस हेतु कुछ समय की समय सीमा तक सब्सिडी मिलना आवश्यक है। और ये ज्वलंत समस्या है कि इस हेतु आवाज उठाने वाले को मजदूर-विरोधी घोषित कर दिया जाता है ! बागानों का अस्तित्व रहेगा तभी चाय श्रमिक भी होंगे और जैसे धीरे-धीरे बागान लुप्त होते जा रहे हैं वैसे ही चाय बागान-“श्रमिकों” का भी अस्तित्व लुप्त हो रहा है ! बागानों की जमीन अतिक्रमण का शिकार होती जा रही है ! ये सच्चाई है कि हमारी सरकार गरीबों के उद्धार हेतु प्रतिबद्ध है ! अनेकानेक योजनाओं के द्वारा सरकार ने अति-निर्धन वर्ग को एक सोपान ऊपरी स्तर तक लाकर उनके जीवन स्तर में आमूल-चूल परिवर्तन लाने का असफल प्रयास किया है इसे असफल कहने के पीछे मेरा मन्तव्य बिलकुल स्पष्ट है कि उनके वो पैसे जो सरकार देती है वे-“दवा अर्थात दारू” में डूबते जाते हैं ! डूबते जाते हैं क्योंकि ग्रामीण अंचल,चाय बागान और नगरीय क्षेत्रों में दूध की दुकानें खोजने पर नहीं मिलतीं किन्तु दारू के अड्डे हर मोहल्ले में मिल जायेंगेक्रमशः ..आनंद शास्त्री सिलचर, सचल दूरभाष यंत्र सम्पर्कांक 6901375971″

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