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जागरूकता से ही रूक सकते हैं महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध। सुनील कुमार महला

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देश में महिलाओं के विरुद्ध बढ़ते अपराध गंभीर चिंता का विषय हैं। महिला अपराधों की यहां अगर हम बात करें तो महिलाओं के विरुद्ध अपराधों में बलात्कार, हत्या के साथ बलात्कार, दहेज, तेजाब हमले, आत्महत्या के लिए उकसाना, अपहरण, जबरन शादी, मानव तस्करी, आनलाइन उत्पीड़न जैसे अपराध शामिल किए जा सकते हैं। एनसीआरबी की एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2021 में महिलाओं के खिलाफ अपराध में 15 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई, जबकि बलात्कार के मामले 12 प्रतिशत तक बढ़ गये। बीते 10 वर्षों में महिलाओं के विरुद्ध अपराध में 75 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज हुई है। यह गंभीर और संवेदनशील है कि राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार 2021 में महिलाओं के विरुद्ध प्रति घंटे उनचास अपराध दर्ज किए गए। यानी एक दिन में औसतन छियासी मामले दर्ज किए गए। 2021 में बलात्कार के 31,677 मामले दर्ज हुए, जबकि 2020 में यह संख्या 28,046 थी। इसी तरह अगर राज्यवार महिलाओं के विरुद्ध अपराध की दर देखी जाए तो राजस्थान (6,337) पहले स्थान पर है, फिर मध्य प्रदेश (2,947), महाराष्ट्र (2,496), उत्तर प्रदेश (2,845) और दिल्ली (1,250) हैं। बहरहाल , यहां पाठकों को जानकारी देना चाहूंगा कि एक प्रतिष्ठित हिंदी दैनिक में हाल ही में छपी एनसीआरबी (राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो) बताती है कि वर्ष 2022 में यानी कि पिछले साल राजस्थान में बलात्कार के 5399 मुकदमे दर्ज हुए, जो कि देश में सर्वाधिक है। दूसरे शब्दों में कहें तो एनसीआरबी की रिपोर्ट में महिला उत्पीडन में राजस्थान टाप पर है। जानकारी देना चाहूंगा कि वर्ष 2022 के दौरान 45,058, वर्ष 2021 के दौरान 40,738 तथा वर्ष 2020 में 34,535 महिला उत्पीडन केस दर्ज हुए, इनमें जयपुर में वर्ष 2022 में 3479, वर्ष 2021 में 2827 और वर्ष 2020 में 2369 केस दर्ज किए गए। यहां पर बहुत ही संवेदनशील और चिंताजनक पहलू यह है कि बलात्कार मामलों को लेकर सुर्खियों में रहे राजस्थान में सर्वाधिक प्रकरण भीलवाड़ा  में दर्ज हुए। भीलवाड़ा, भरतपुर, उदयपुर, अलवर और अजमेर राजस्थान प्रदेश में बलात्कार के सर्वाधिक केस वाले क्षेत्र रहे हैं। यदि हम यहां आंकड़ों पर गौर करें तो भीलवाड़ा में कुल 301, भरतपुर में 288, उदयपुर में 283, अलवर में 253 तथा अजमेर में 206 बलात्कार के केस पाये गये हैं। कुछ समय पहले कोटड़ी क्षेत्र के भट्टी कांड की गूंज पूरे देश में सुनाई दी थी। इतना ही नहीं, विधानसभा चुनाव के दौरान भी बलात्कार की घटनाएं सुर्खियों में रहीं। जानकारी देना चाहूंगा कि नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2022 में राजस्थान में बलात्कार के मामलों में भीलवाड़ा जिला पहले, भरतपुर दूसरे तथा उदयपुर जिला तीसरे स्थान पर रहा। राजस्थान में बलात्कार के सर्वाधिक 5399, उत्तर प्रदेश में 3690, मध्यप्रदेश में 3029 और महाराष्ट्र में 2904 मुकदमे दर्ज हुए। यह लगातार चौथा साल है, जब राजस्थान में बलात्कार के सर्वाधिक मामले सामने आए। राजस्थान में वर्ष 2019 में 5997, वर्ष 2020 में 5310, वर्ष 2021 में 6337 और वर्ष 2022 में 5399 केस दर्ज हुए। हालांकि भारत में अपराध पर एनसीआरबी रिपोर्ट 2022 के अनुसार यदि हम समग्र अपराध आंकड़ों की यहां बात करें तो वर्ष 2021 की तुलना में मामलों के पंजीकरण में 4.5% की गिरावट देखी गई है लेकिन राजस्थान के आंकड़े अचंभित करते हैं। एनसीआरबी रिपोर्ट वर्ष 2022 यह भी बताती है कि अपराध दर में गिरावट आई है। यदि हम यहां आंकड़ों की बात करें तो प्रति लाख जनसंख्या पर अपराध दर वर्ष 2021 के 445.9 से घटकर 2022 में 422.2 हो गई। पाठकों को यहां यह जानकारी देना उचित होगा कि महानगरों में प्रति लाख जनसंख्या पर सबसे कम संज्ञेय अपराध दर्ज करते हुए कोलकाता लगातार तीसरे वर्ष भारत का सबसे सुरक्षित शहर बनकर उभरा है। वहीं पर पुणे (महाराष्ट्र) और हैदराबाद (तेलंगाना) ने क्रमशः दूसरा एवं तीसरा स्थान हासिल किया। हाल फिलहाल, यहां चर्चा करना उचित होगा कि एनसीआरबी रिपोर्ट 2022 बताती है कि राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना जैसे राज्यों में वर्ष 2022 में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के खिलाफ अपराधों में बढ़ोतरी देखने को मिली है। आंकड़े बताते हैं कि मध्य प्रदेश और राजस्थान प्रमुख योगदानकर्त्ताओं के रूप में बने हुए हैं, जो एससी और एसटी समुदायों के खिलाफ अपराध एवं अत्याचार की सबसे अधिक घटनाओं वाले शीर्ष पाँच राज्यों में लगातार प्रमुख स्थान पर हैं। यह चिंताजनक है कि वर्ष 2022 में महिलाओं के खिलाफ अपराध के कुल 4,45,256 मामले दर्ज किये गए, जो वर्ष 2021 की तुलना में 4% अधिक हैं। एनसीआरबी रिपोर्ट 2022 बताती है कि बच्चों के  विरुद्ध अपराध के मामलों में वर्ष 2021 की तुलना में 8.7% की वृद्धि देखी गई है। उल्लेखनीय है कि इनमें से अधिकांश मामले अपहरण (45.7%) से संबंधित थे और 39.7% मामले यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम के तहत दर्ज किये गए थे। आज कानून व्यवस्था को लेकर अपराधियों के मन में किसी भी प्रकार का डर या भय नहीं रह गया है, इसलिए समाज में आज महिलाओं के खिलाफ अत्याचार, बलात्कार, क्रूरता,हिंसा की घटनाओं में वृद्धि देखने को मिल रही हैं। आज महिलाओं की स्थिति को लेकर आम आदमी के साथ ही सरकार को भी और अधिक जवाबदेह और संवेदनशील होने की जरूरत है। महिला सुरक्षा के लिए समाज के हर व्यक्ति को आगे आने की जरूरत है। समय समय पर कानून में बदलाव की भी जरूरत होती है। उल्लेखनीय है कि
निर्भया केस के बाद जब पूरे देश में आंदोलन खड़ा हुआ, तो जस्टिस वर्मा समिति की सिफारिशों के आधार पर बलात्कार के कानून में बदलाव हुआ। इसी तरह, दहेज के खिलाफ आंदोलन के बाद हर जिले में दहेज विरोधी सेल गठित किये गये। कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा के लिए समितियों का गठन किया गया। घरेलू हिंसा के खिलाफ हर जिले में प्रोटेक्शन ऑफिसर की नियुक्ति का कानून बना। महिला सुरक्षा में विभिन्न महिला संगठनों तथा सामाजिक संगठनों को भी सतर्क व जागरूक रहने की आवश्यकता है। कहना ग़लत नहीं होगा कि
अपराध में कमी के लिए समाज को महिला अपराधों को लेकर अपनी सक्रियता लगातार बढ़ानी होगी। उन्हें अपराध के खिलाफ एकजुट होकर आगे आना होगा, न कि चुपचाप अपराध होते देखते रहना होगा। इतना ही नहीं,सरकार की जवाबदेही भी सुनिश्चित करनी पड़ेगी। कानून लागू करवाने की जिम्मेदारी सरकार की होती है, तो उसे यह जिम्मेदारी पूरी सक्रियता से निभानी होगी‌। आज के समय में बजट भी एक बहुत बड़ी समस्या है। महिलाओं की सुरक्षा के लिए अधिक से अधिक बजट का आवंटन करना होगा। बहरहाल ,एनसीआरबी की रिपोर्ट यह कहती है कि रेप के ज्यादातर मामलों में रिश्तेदार या परिचित ही आरोपी हैं। रिपोर्ट बताती है कि 576 मामलों में परिवार के किसी सदस्य ने ज्यादती की।1493 मामलों में दोस्त, वर्चुअल फ्रेंड, लिव इन पार्टनर और तलाकशुदा पति ने महिला को शिकार बनाया। 3062 केस ऐसे, जिनमें पारिवारिक दोस्त, पड़ोसी और कर्मचारी ने महिला को निशाना बनाया है तथा 268 मामलों में आरोपी पीड़िता का गैर जानकर या अज्ञात व्यक्ति था। वास्तव में, किसी भी समाज में अपराध का लगातार बढ़ना समाज में असंतुलन की स्थिति ही पैदा करता है। आज भारत में महिलाओं के खिलाफ अपराध लगातार बढ़ रहे हैं।इसलिए भारत में महिलाओं के खिलाफ बढ़ती अपराध की दर चिंता का कारण बनता जा रहा है। ऐसे में महिलाओं की सुरक्षा के लिए त्वरित व सख्त से सख्त कदम उठाए जाने बहुत ही जरूरी हैं। आज भावनाएं अर्थहीन हो गई हैं, समाज अपनी संस्कृति को भूलता चला जा रहा है और हम पाश्चात्य संस्कृति की ओर मुड़ चले हैं। यह बहुत गंभीर और संवेदनशील है कि आज महिलाओं के विरुद्ध होने वाले अपराधों में अधिकांशत: उनका अपना ही कोई नजदीकी या परिवार का सदस्य शामिल होता है (जैसे भाई, पिता, पुत्र, पति, ससुर, मित्र)। आज अनेक सार्वजनिक मंचों से महिला सुरक्षा के दावे तो किए जाते हैं, मगर यथार्थ में उन दावों को यथार्थ में बदलने के लिए कुछ खास नहीं किया जाता। यही कारण है कि महिलाओं के विरुद्ध अपराधों को रोक पाना संभव नहीं हो रहा। कभी साक्ष्यों के अभाव में, कभी ढुलमुल न्यायायिक प्रक्रिया के कारण और कभी आर्थिक और राजनीतिक प्रभुत्व के कारण दोषियों को सजा नहीं मिल पाती है। ऐसे में कानून के भय का समाप्त होना स्वाभाविक है। यह भी एक तथ्य है कि वैश्वीकरण के बाद से धन और शक्ति का असमान वितरण तथा प्रौद्योगिकी का तीव्र विकास भी अपराध का महत्त्वपूर्ण कारण बन कर उभरा है। भारत तो ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:’ में विश्वास रखने वाला देश रहा है। मतलब यह है कि जिस स्थान पर स्त्रियों की पूजा की जाती है और उनका सत्कार किया जाता है, उस स्थान पर देवता सदा निवास करते हैं और प्रसन्न रहते हैं। जहां ऐसा नहीं होता है, वहां सभी धर्म और कर्म निष्फ़ल होते हैं। लेकिन आज हमारे समाज में यह हो क्या रहा है ? हमारा समाज किस दिशा में जा रहा है ?  यहां एक तरफ नवरात्रि में कन्याओं का पूजन किया जाता है, उनकी पूजा करके उनसे सुख समृद्धि की कामना की जाती है और दूसरे ही दिन किसी कन्या के साथ दुर्व्यवहार करके, अहिंसा व अत्याचार करके उससे जीने का अधिकार ही छीन लिया जाता है इसे (पुरुष) समाज का दोहरापन ही कहा जा सकता है। बहरहाल, आज महिलाओं की सुरक्षा के लिए विभिन्न कदम उठाए जाने की आवश्यकता है। इसके लिए शिक्षा का अधिकाधिक प्रचार प्रसार किया जाना चाहिए ताकि महिलाएं अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो सके। वास्तव में,
शिक्षा ही वह माध्यम है जो अन्य अधिकारों को सुरक्षित करने के लिए लड़कियों और महिलाओं को सक्षम करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
बेटियों को गुड टच व बेड टच के बारे में बतायें जाने की आवश्यकता है। बेटियों को स्कूलों में सेल्फ डिफेंस की शिक्षा अनिवार्य रूप से दी जानी चाहिए। हर स्कूल में अवेयरनेस प्रोग्राम चलाए जाने की आवश्यकता है। इतना ही नहीं आमजन को कानून की जानकारी दी जानी चाहिए। सभ्यता एवं संस्कृति की पहचान बहुत ही जरूरी है। न्यायालय में महिला मामलों के जल्द निस्तारण की व्यवस्था होनी चाहिए, ताकि दोषियों को जल्द से जल्द और सख्त सजा मिल सके। इतना ही नहीं महिलाओं के लिए बने कानूनों के प्रति महिलाओं को जागरूक व संवेदनशील बनाने के लिए सतत विधिक साक्षरता शिविरों का आयोजन भी किया जा सकता है। अभिभावकों को यह चाहिए कि वे अपने बच्चों के मोबाइल आदि पर विशेष नजर रखें और उनके साथ सकारात्मक और अच्छा व्यवहार रखें ताकि किसी समस्या के होने पर वे बात करने में हिचकिचाएं नहीं। बेटियों को संस्कार व सीख देने की भी जरूरत है। इतना ही नहीं नयी पीढ़ी को भारतीय संस्कृति, अध्यात्म के साथ ही रामायण,गीता, वेद, उपनिषद आदि का ज्ञान भी देना चाहिए। अंत में यही कहूंगा कि महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराधों को रोकने के लिए जागरुकता ही एकमात्र उपाय है। तो आइए हम सभी महिलाओं की सुरक्षा के लिए अपने कदम आगे बढ़ायें क्यों कि महिलाएं, परिवार के साथ-साथ समाज की रीढ़ भी हैं। महिलाओं ने विभिन्न सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन में देश में अहम भूमिका निभाई है। वर्तमान युग महिलाओं का युग है और आने वाले समय में महिलाएं सामाजिक और आर्थिक रूप से और अधिक सुदृढ़ होकर उभरेंगी।
(आर्टिकल का उद्देश्य किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं है।)
सुनील कुमार महला, फ्रीलांस राइटर, कालमिस्ट व युवा साहित्यकार, उत्तराखंड।
मोबाइल 9828108858

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