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“न कालो दण्डमुद्यम्य शिरः कृतन्ति कस्यचित्” — आनंद शास्त्री

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सम्माननीय मित्रों ! संत तुलसीदास जी कहते हैं कि-
“राम किसी को मारत नहीं, इतने पापी नहीं राम।
अपने- अपने पाप से, मर जाते हैं आपोआप॥”
यत्र तत्र सर्वत्र मंहगाई,बेरोजगारी और भ्रष्टाचार का आरोप लगाने वाला देश का सबसे मंहगा और भ्रष्ट राजनैतिक दल अर्थात-“भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस” आज अपनी अर्थी अपने कन्धों पर ढोने को बाध्य है ! हमें यहाँ यह भी ध्यान रखना होगा कि- “भैंसों की लडाई में हम कीचड़ में सन जाते हैं और मजा भैंसों को आता है !” इस हमाम में कौन कितना अधिक नंगा हो सकता है ! ये प्रतिस्पर्धा का विषय बन चुका।
मित्रों ! लंका सोने की थी तथापि लंकेश चैन से कभी -“सो”नहीं सका ! क्यों कि उसकी क्षुधा उसे ब्राम्हण से क्षुद्र बना चुकी थी !
न जाने कितने लंकेश आये और चले गये ! लंका के भाग्य में जलना ही लिखा था ! वो जल गयी ! जल रही है और जलती ही रहेगी ! उसका भी कारण है-संस्कृति संस्कार और सम्पत्ति जब अपहरण कर रखी जाती है तो श्रीराम के दूत उस स्थान को जलाकर भष्म कर देते हैं ।
राहुल गांधी से लेकर मोमता बनर्जी (?)तक सभी ने जिस केन्द्रीय सरकार पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया आज उनके ही घरों को अरबों-खरबों की सम्पदाग्नि गगनचुम्बी लपटों में जलाकर खाक कर देने को व्याकुल हो रही हैं ! अर्थात अपने ही हाथों अपना घर फूंक डाला इन लोगों ने। मित्रों मैं कहता हूँ कि-
“न कालो दण्डमुद्यम्य शिरः कृतन्ति कस्यचित्”
कालस्य बलमेतावत् विपरीतार्थदर्शनम् ॥”
महात्मा विदुर ने महाभारत में इस श्लोक के द्वारा जो कहा वही घटित हुवा ! काल किसी का मस्तक नहीं काटता,वह बुद्धि को मोहित कर देता है जिससे अन्याय पथ न्यायोचित लगता है, मनुष्य विनाश की ओर बढता है अर्थात-“बुद्धिभेद ही काल का बल है” वो दिन दूर नहीं जब-“इस्लाम खतरे में” के स्थान पर- “कांग्रेस खतरे में” का जुमला आप उठता देखें ! अंतःस्थल व्यथित इस तथ्य पर होता है कि जिन्होंने वास्तव मेँ जनता जनार्दन की सेवा की,जो भूखे पेट पुरानी जंग लगी सायकिल पर झोले में रास्ट्रीयता और हिन्दुत्व की कुछ प्रेरक पुस्तकें लेकर सुदूर
क्षेत्रों में,चाय बागानों की धूल फांक कर अपना पेट भरते थे ! हिन्दू राष्ट्र की अलख जगाते थे ! वे लोग आज हाशिये पर आ गये और सोने चांदी के चम्मच लेकर अभी कल को बीजेपी में आये लोग उन्हीं पर शासन करने को नियुक्त कर दिये गये।
मित्रों ! आज जो कांग्रेस में हो रहा है ! क्या इससे हमारी हिन्दुत्ववादियों की सरकारों को भी सचेत होने की आवश्यकता नहीं है ?
जब भी कभी आयकर विभाग अथवा अन्यान्य केन्द्रीय विभागों की किसी पर कार्रवाई होती है तो उसे राजनीति के चश्मे से देखने की आवश्यकता पडनी स्वाभाविक प्रतिक्रिया बन चुकी किन्तु लगभग प्रत्येक दिन किसी न किसी कम्पनी की होती जांच अथवा छापे की कार्रवाई सुर्खियों में क्यों नहीं आतीं ? अडानी समूह पर सर्वोच्य अमेरिकी जाँच एजेंसी एवं भारतीय सर्वोच्य न्यायपालिका द्वारा दी गयी क्लीन चिट पर उनपर उठती उंगलियांअचानक पक्षाघात का शिकार क्यों हो गयीं ? अब सदन में बीजेपी और अडानी के भ्रष्टाचार का मुद्दा पुनश्च कांग्रेस किस मुंह से उठायेगी ?
मित्रों ! इसी परिप्रेक्ष्य में ऋषियों ने कहा है कि-“ वृणते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव संपदः” अर्थात आवेश में आकर ,विवेक शून्यावस्था कोई कार्य नहीं करना चाहिए,जो भलीभांति विचार कर किसी कार्य को करते हैं अथवा सभा में कहते हैं भाग्य लक्ष्मी स्वयं ही उनका चुनाव कर लेती हैं। यह निश्चित है कि आज समूचा विश्व,भारत वर्ष और हमारा असम ! हमारी बराक उपत्यका संक्रमण काल से गुजर रही है ! आज हमारे सम्पूर्ण समाज को अत्यंत ही धैर्य पूर्वक चलने की आवश्यकता है ! आने वाले कल योग्य प्रतिनिधि को चुनने की आवश्यकता है ! वह प्रतिनिधि किस दल की दल-दल से आया है इसकी अपेक्षा ये देखने की आवश्यकता है कि जिन संस्कारों से आया है उनमें राष्ट्रीय अस्मिता है। अथवा नहीं ।
ये हमारे राष्ट्रीय सौभाग्य की पराकाष्ठा है कि उच्चस्तरीय राजनैतिक -आर्थिक निर्णयों में धीरे-धीरे-“जातिवाद, परिवारवाद,भाषावाद और प्रान्तीयता” से ऊपर उठकर निर्णायक छमता का शुभारंभ हुवा -“छत्तीसगढ़,मध्यप्रदेश एवं राजस्थान” के मुख्यमंत्री चयन में दिखता है, उन राज्यों में शीर्ष नेतृत्व द्वारा हुवे स्पष्ट हस्तक्षेप ने हजारों हजार उन नेताओं की नींव और नींद दोनों ही हिलाकर रख दी है जो ये सोचते थे कि चुनाव जीतने के पश्चात सत्ता उनकी बपौती है ! वे जैसे चाहेंगे उसी प्रकार शाषन करेंगे और अपने लोगो को रेवडियाँ बांटते हुवे केवल और केवल अपनी ही उन्नति पर ध्यान देंगे।
मित्रों ! इस संदर्भ मे महाभारत का यह श्लोक भी प्रासंगिक है कि-
“नेह चात्यन्त संवासः कर्हिचित्त केनचित् सह।
राजन् स्वेनापि देहेन किमु जायात्मजादिभिः॥”
इस जगत में ! विशेषतः राजनैतिक जगत् में कभी भी,किसी भी किसी का स्थायी सम्बन्ध नहीं रह सकता ! अपने शरीर तक से नहीं ! बन्धु,बान्ध,पत्नी,पुत्र ,मित्रों की बात ही करनी व्यर्थ है ! हम ये भलीभांति समझ सकते हैं कि-“बूढे भारत में भी फिर से आयी नयी जवानी है” और आयु वृद्धि के साथ यदि शरीर और संकल्प वृद्ध न हो तो ऐसा शक्तिमान संगठन नीर-क्षीर का विवेक करने में सक्षम और समर्थ होने के कारण बडे बडे नेताओं को भगवे ध्वज के समक्ष ध्वज प्रणाम करते हुवे -“नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे” कहने को बाध्य कर सकता है, कर रहा है ! और राष्ट्रीय हित में यह अत्यंत ही प्रशंसनीय एवं अनुकरणीय है
..आनंद शास्त्री सिलचर, सचल दूरभाष यंत्र सम्पर्कांक 6901375971″

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