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बराक नदी केवल आपकी ही नहीं हमारी भी गंगा है…

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प्रिय मित्रों ! ये आप सभी जानते हैं कि-“प्रेस और पत्रकारिता- समाज और सरकार” के मध्य एक सेतु का कार्य करती है और इस सेतु का उत्तरदायित्व प्रेस इन्फार्मेशन ब्यूरो के पास सन् १९१९ से ही सुरक्षित है ! सरकारें आती जाती रहती हैं ! यहाँ तक कि ब्रिटिश सत्ता भी चली गयी किन्तु पीआईबी अभी भी यथावत है ! भारतीय अस्मिता के स्थानीय कट्टर विरोधी भाषायी भेद के कारण हिन्दी भाषी समुदाय को येन केन प्रकारेण हाशिये पर रखने हेतु जिस जहरीली विचारधारा का बीजारोपण इन लोगों ने किया था आज भी उसी लकीर पर ये चल रहे हैं। भारत के स्वतंत्रता संग्राम से लेकर आजतक बांग्ला भाषी लोगों के प्रतिनिधियों ने इस सेतु का ही बांग्ला करण कर दिया है ! इनके विचार से बराक उपत्यका पर एकक्षत्र शाषन है इनका ! ये कहते हैं कि हिन्दीभाषी लोग बाहर से आये हैं ! आप जानते हैं कि ये लोग भी बाहर से ही आये हैं ! “कछार कछारियों” का है ! जितना अधिकार आप का है बिलकुल उतना ही अधिकार हमारा भी है ! और हमारा अधिकार हम लेकर ही रहेंगे।
सन् १९१९ से ही प्रेस पर इनके अधिकार के कारण हम हिन्दीभाषी समुदाय के लोगों का नाम स्वतंत्रता संग्राम से लेकर किसी भी आंदोलन अथवा कि उल्लेखनीय कार्यों में न आने देना ! हमारे पूर्वजों के बलिदान को उपेक्षित करना ! हिन्दी को उपेक्षित करना-“हिन्दुस्थान” की उपेक्षा करना है। चाय बागान श्रमिकों को गुलदस्ते की संज्ञा देने वाले लोगों को ये जान लेना चाहिए कि गुलदस्ते नेताओं को दिये जाते हैं अथवा कब्रों पर चढाये जाते हैं ! और यहाँ अर्थात कम से कम बराक उपत्यका में हिन्दी भाषी समुदाय में ऐसे लोग नहीं हैं जिनकी कब्र बनती हो ! किन्तु बांग्ला भाषी लोगों में आधे लोग ऐसे हो चुके हैं जिनकी कब्र बनती है ! किन्तु दुर्भाग्य से कब्रिस्तान जाने वाले लोगों को ये लोग अपना समझते हैं और हमें-“पराया”।
मित्रों ! हमारी ये मजबूरी है कि हम भारत को-“I.N.D.A.नहीं बनता देख सकते ! हमारे पूर्वजों ने प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से लेकर आजतक केवल बलिदान ही दिया है ! और इसके बदले उनका नाम ही इतिहासकारों ने मिटा दिया ! और इसका पूरा उत्तरदायित्व-“संचार माध्यमों” का है।मुझे आश्चर्य होता है कि स्वतंत्रता संग्राम के पश्चात अपने ही भाषा-भाईयों से लुट-पिट कर
वहां से पलायन किया ! जिनसे पिटे उनको ही पुनश्च गोद में बैठाया ! बांग्ला देश मुक्ति संग्राम के नाम पर वहां से भागना पडा ! उस समय तो पूरे देश ने आपकी सहायता की ! समूचे चाय बागानों के श्रमिकों ने आपका सहयोग किया ! आपके नेतृत्व को स्वीकार किया ! किन्तु आप लोगों ने आजतक कभी भी हम हिन्दीभाषी समुदाय के लोगों को पनपने नहीं दिया।
भारत वर्ष में हमारी आवाज न सुनायी दे इसके लिये हमेशा ही षड्यंत्र किये गये ! और वर्तमान में भी पीआईबी के इस कदम से ये स्पष्ट है कि आपलोगों ने बराक उपत्यका में-“हिन्दी की हत्या” करने की सुनियोजित साज़िश कर रखी है। ये सभी जानते हैं कि बराक उपत्यका अथवा कछार की अधिकृत सरकारी वेबसाइट
में हिन्दी भाषी समुदाय का कोई भी उल्लेख नहीं है ! यहाँ केवल बांग्ला भाषी लोग रहते हैं ? भाषा शहीदों की शहादत का हम ह्रदय से सम्मान करते हैं ! किन्तु हमारे स्थानीय पूर्वजों की शहादत को आप लोगों ने बिलकुल ही नकार दिया ? आपकी रगों में बांग्ला का खून बहता होगा किन्तु हमारी रगों में-“भारत माता” का खून हिलोरें लेता है ! असमिया सरकार पर आपकी उपेक्षा करने का आरोप आपको सही लगता है ! किन्तु हमारी उपेक्षा करने का आपको-“जन्मसिद्ध अधिकार किसने दिया है ?
सन् १९९५ से हम हिन्दीभाषी और हिन्दू समुदाय के लिये अपना सम्पूर्ण जीवन लगाने वाले दिलीप कुमार के भगीरथ कार्य की उपेक्षा करने की कार्यशैली आपकी पहले से चली आ रही है ! बीजेपी को यहाँ लाने में अर्थात श्री कवीन्द्र पुरकायस्थ जी को विजय दिलाने से लेकर आजतक दिलीप कुमार के अविस्मरणीय सहयोग की उपेक्षा ही नहीं उनका और समूचे प्रेरणा भारती परिवार अर्थात हिन्दी भाषी समाज की उपेक्षा कर आपने ये संदेश तो पूरे भारत में दे दिया कि-“बराक उपत्यका में हिन्दी भाषी समुदाय का अस्तित्व नहीं है !” किन्तु आपके दुर्भाग्य से हमारे दिलिप कुमार अभी भी जीवित हैं ! मैं भी अभी पचहत्तरवीं सीढी पर उनके साथ खडा हूँ ! ये निश्चित है कि जिस प्रकार मैतेयी समुदाय और असम राइफल्स को समूचे देश में लज्जित करने हेतु चर्च और म्यांमार के लुटेरों से गठबंधन कर कांग्रेस आज मणिपुर को जला रही है ! बिलकुल वैसे ही बांग्ला देशी घुसपैठियों और आतंकवादियों के साथ मिलकर यहाँ बैठे कांग्रेसी भाडे के टट्टू अर्थात दलबदलू लोग पुनश्च प्रेस इन्फार्मेशन ब्यूरो में हिन्दी भाषी समुदाय के एकमात्र प्रतिनिधि समाचार पत्र प्रेरणा भारती को निमंत्रण न देकर उसी कांग्रेस के नियंत्रण में आ रहे हैं जिसके कारण आपलोगों को तथाकथित पूर्वी पाकिस्तान से भागकर यहाँ आना पडा ! हमारे यशस्वी प्रधानमन्त्री जी,मुख्यमंत्री जी,सूचना एवं प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर जी को ये सच्चाई समझनी होगी अन्यथा आने वाले कल बराक उपत्यका में बीजेपी की लुटिया डूबोकर- “I.N.D.I.A.”की सत्ता स्थापित कराने का सपना बीजेपी के पदाधिकारियों ने ही देखना प्रारम्भ कर दिया है। ये कडवी सच्चाई है कि मुगलिया कूटनीति है -“जयचंद और मानसिंहों को संरक्षण देने की ! और आपलोगों ने ये सिद्ध कर दिया है कि आप-‘विभीषण” नहीं हैं ! हमारी आपसे विनम्र विनती है कि जिस -“मथुरा,वृन्दावन, हरिद्वार,प्रयाग,अयोध्या, काशी और गया जी” में आप इतनी श्रद्धा से जाते हैं ! अपने पूर्वजों को तारने की विनती करने जाते है ! उन पवित्र तीर्थ स्थलों पर हमारा आपका समान अधिकार है ! उतना ही अधिकार हमारा बराक उपत्यका पर भी है ! हम हिन्दीभाषी समुदाय के लिये बराक नदी गंगा के समान पवित्र है ! हमारी गंगा बराक में और वैष्णो देवी काचा कांति में है ! हमारी मथुरा नरसिंह अखाडे में और काशी ब्रम्हबाबा मन्दिर में है ! हमारी कुलदेवी खासपुर की कछारी देवी माँ हैं ! हमारे आदर्श क्रांतिवीर सुभाष चन्द्र बोस जी हैं ! हम रामकृष्ण परमहंस के भी उपासक हैं !  और इनपर हमें उतना ही गर्व है जितना उन तीर्थक्षेत्रों और महान व्यक्तित्वों पर ! हमारा आपसे अनुरोध है कि कृपया इस-“पत्रकारिता के सेतु” पर भाषायी जजिया कर लगाकर इसे बाधित न करें–“आनंद शास्त्री”


आजादी का अमृत महोत्सव-(कांग्रेस की कलंक कथा)(२)
मित्रों ! ये सनातन सत्य है कि अमृत कलश की प्राप्ति हेतु समूचे समुद्र का मन्थन करना होता है ! इस मन्थन हेतु सुदृढ़ और सशक्त योजना की आवश्यकता होती है ! दैवी और आसुरी शक्तियों को एकसाथ आना पडता है ! नाग की रस्सी और मन्दराचल को मथानी बनाना पडता है ! अथक श्रमोपरान्त सर्वप्रथम-“हलाहल विष” निकलता है ! जिससे चारों दिशाओं में हाहाकार मच जाता है ! और ऐसा ही आज से पचहत्तर वर्ष पूर्व हुवा था।
१४\०८\१९४७ को अखण्ड भारतवर्ष के हिन्दुओं को- “नीलकंठ” बनना पडा था ! ये सच्चाई है कि १५\०८\१९४७ अर्धरात्रि में स्वतंत्रता की देवी अमृत कलश के साथ प्रकट हुयीं थीं ! किन्तु इसका बहुत बडा मूल्य हिन्दू समाज को चुकाना पडा था ! अर्वाचीन वैश्विक इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी से केवल हिन्दू समाज को गुजरना पडा था ! २ करोड़ से भी अधिक संख्या में गांधी और कांग्रेस के स्वघोषित पाकिस्तान से हम हिन्दुओं को अपना सबकुछ छोड़ कर आना पडा था ! हमारे घरों को मुस्लिम राक्षस जला रहे थे ! हमारी बच्चियों के साथ लाहौर से लेकर ढाका तक सडकों पर मुहम्मद के लुटेरे सामूहिक बलात्कार कर रहे थे ! युवाओं और वृद्धों की नृशंस हत्या कर रहे थे ! और गांधी बिडला भवन में हिन्दुओं को शान्ति का संदेश पढा रहे थे ! नेहरू अपनी जवाहराती कुर्सी पर बैठने का जब स्वप्न देख रहे थे तब-“बाप्पा रावल द्वारा स्थापित प्रसिद्ध शिव-पिण्ड स्थली अर्थात “रावलपिंडी” के मन्दिर को मुगलिया लालकुर्ती वाले जिन्ना के जेहादी लुटेरे लूट रहे थे।
मित्रों ! आज मणिपुर में अपनी चुनावी रोटी सेंकने वाली ये वही कांग्रेस है जिसमें न नैतिकता कल थी न आज है और न कभी होगी। तीस लाख से भी अधिक हिन्दुओं की नृशंस हत्या मात्र तीन दिनों में कराने का श्रेय इसी कांग्रेस को जाता है जो आज मणिपुर की स्थिति पर संसद के गलियारों में घडियाली आँसुओं से देशवासियों को भरमा रही है ! उस समय बारह लाख से भी अधिक हिन्दू बंगाली और सिख बच्चियों के साथ हुवे सामूहिक बलात्कार पर आजतक कांग्रेस ने माफी मांगी ?
स्वतंत्रता पूर्व केवल पश्चिमी पाकिस्तान में विशाल मन्दिरों की श्रृंखला में ४२८ मन्दिर चिन्हित किये गये थे जिनमें से १०० से भी अधिक मन्दिरों को ११,१२,१३,१४/०८/१९४७ को ही ध्वस्त कर दिया गया तबतक वहाँ ब्रिटिश सरकार के अधीन कांग्रेस की सरकार थी ! फिलहाल अब तो केवल २२ हिन्दू मन्दिर ही पाकिस्तान में जीर्ण-शीर्ण अवस्था में पडे दिखते हैं ! इन मन्दिरों के हुवे विध्वंस का कलंक कांग्रेस लेगी ? मित्रों ! आज के बांग्ला देश में स्थित-“गाजी पुर” का नामकरण  तभी पन्द्रह हजार बंगाली हिन्दूओं की हत्या कर रखा गया था।क्या ये बात आपको दिवंगत “संतोष मोहन देव” ने बताई ?
तद्कालीन पूर्वी पाकिस्तान के प्रसिद्ध-” गोपाल गंज के लड्डू गोपाल मन्दिर” को ध्वस्त कर वहाँ मस्जिद बना दी गयी ! किशोर गंज,माणिक गंज से लेकर सिलहट तक का समूचा क्षेत्र हिन्दू बंगालियों की लाशों से पटा पडा था ! उनके अंतिम संस्कार की बात छोड़िये कांग्रेसी गिद्ध और कौवे उन लोथों को नोंच रहे थे। हमारे देश का बंटवारा आर्थिक संशाधनों के आधार पर हुवा था ! तद्कालीन प्राप्त खनिज सम्पदाओं के भण्डार,नदियों,रेलवे, परियोजनाओं,बन्दरगाहों,नगरीय विकास,बैंकों में स्थित कैश, पुलों,परिवहन के उपलब्ध संसाधनों, के आधारभूत ढांचे पर तद्कालीन बंटवारे की बार्डर लाइन बिना देखे ही इंग्लैंड में बैठकर बंदर-तराज़ू के द्वारा लार्ड माउंटबेटन के कहने पर रेडक्लिफ महोदय ने खींची थी ! अर्थात आर्थिक संशाधनो का एक तिहाई भाग अपने परम मित्र तद्कालीन पाकिस्तान के अब्बा जिन्ना को हम हिन्दुओं की जनाजे फातिहा पढने के साथ-साथ दस्तरख्वान पर परोश दिया था ! अर्थात पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान का बंटवारा कब-कहाँ-कैसे और किसने किया ये हम वही भारतीय नहीं जानते थे जिन्होंने अपने सीने पर गोलियां खायीं थीं ! और वे बेशर्म कांग्रेसी और मुस्लिम लीग के शीर्षस्थ नेता जरूर जानते थे जिनके कपड़े तक इंग्लैंड की लांड्री में धुलने जाते थे।
यहाँ ये स्मरणीय है कि बंटवारे की प्रबल विरोधी हिन्दूमहा सभा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ,भारत सेवा आश्रम के स्वयंसेवकों ने अपने प्राणों की आहुति देकर भी हिन्दुओं की रक्षा की वहीं कांग्रेस के जमीनी कार्यकर्ताओं को अल्लाह के बंदरों के सहारे छोड़ कर हमारे वे कांग्रेसी नेता दिल्ली भाग आये जहाँ उनको -“तिरंगे की डोरी” खींचने की फिक्र सता रही थी। हाँ मित्रों इसी प्रकार हम हिन्दुओं की लाशों पर ,हमारे मन्दिरों के ध्वंसावशेषों पर,हमारी बच्चियों के अपहरण और हमारे घरों गांवों को जलाती
आग के शोलों पर आज ही अर्थात १४\०८\१९४७ को कांग्रेस ने कलंक कथा लिखी थी ! इस कथा के लेखक जिन्ना का पाकिस्तान आज अपनी कट्टरता की आग में खाक ऐ सुपुर्द होता जा रहा और कांग्रेस के रक्त बीजों का अंत भी कुछ ऐसा ही होता दिख रहा! इन्हीं शब्दों के साथ अपने उन पूर्वजों को मैं श्रद्धांजलि देता हूँ जिनकी लाशों के ढेर पर अपनी लाठी टेकते तीन बन्दर अभी भी गूंगे बहरे और अन्धे होने का ढोंग कर रहे हैं-“आनंद शास्त्री” 

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