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मोबाइल की लत से मुक्ति का एकमात्र तरीका – खेल-खिलौनों वाला पालन-पोषण: प्रधानाचार्य डॉ. पार्थ प्रदीप अधिकारी

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१ जून, २०२४, सिलचर – वैश्विक अभिभावक दिवस २०२४ पर, प्रणबानंद इंटरनेशनल स्कूल के एक प्रसिद्ध शिक्षक और प्रधानाचार्य डॉ. ‘पार्थ प्रदीप अधिकारी’ ने बच्चों की मोबाइल और कंप्यूटर  की लत से हो रही हानि जैसे चिंताजनक मुद्दे पर प्रकाश डाला। उन्होंने इस घटना को खेल कूद ,व्यायाम तथा पढ़ाई लिखाई से बच्चों में हो रही  क्षति के कारण हम सभी माता-पिता शिक्षक दोस्त मित्र आदि सभी जिम्मेदार व्यक्ति हैं। आजकल हर अभिभावक की यह शिकायत होती है कि उसका बच्चा दिन भर मोबाइल से चिपका रहता है हालांकि इसकी वजह खुद पेरेंट्स यानी अभिभावक ही है जो हर वक्त मोबाइल में व्यस्त रहते हैं और परिवार के साथ क्वालिटी टाइम बिताने की वजाए मोबाइल पर इंटरनेट का बहाना ढूंढने लगते हैं यही नहीं बच्चों के कई अभिभावक कम उम्र में ही बच्चों को  मोबाइल हाथ में पकड़ा देते हैं और बाद में उसकी बच्चों की आदत लग जाती है तो वह छुड़वाने के लिए शक्ति करने लगते हैं ऐसे में घर का माहौल खराब तो होता ही है बच्चें छिपछिपा कर  मोबाइल का प्रयोग करने लगते हैं अकेले में मोबाइल देखने के चक्कर में कई बार इंटरनेट पर मौजूद गलत चित्र भी देख लेते हैं जो शायद उनकी उम्र के हिसाब से यह सही नहींहै। जो हमारे लिए गलत है लखनऊ में दस साल के बच्चे के हाथ से मोबाइल लेने पर वह  विवाद करने पर उतारू हो जाता है। तो यह सब किसकी जिम्मेदारी  है, अपने बच्चों को मोबाइल देकर आप अपनी दुनिया में लग जाते हैं या व्यस्त हो जाते हैं बच्चों के लिए यह मोबाइल खतरनाक नशे की तरह है उसके दुष्परिणाम दिमाग पर हावी हो रहा है उसकीनींद पढ़ाई-लिखाई, खेल, कूद, व्यायाम पर इसका दुष्प्रभाव पड़ रहा है ।इसी दुष्प्रभाव के कारण आज बच्चे माता-पिता व शिक्षकों की बात नहीं सुनते। आज हमें उन बच्चों को प्यार से शालीनता से अच्छा से समझने की जरूरत है जब प्यार मोहब्बत से समझाया जाएगा।
और उससे होने वाली हानियों के बारे में बताया जाएगा। तो बच्चे अवश्य इन बातों का अमल करेंगे ।और मोबाइल से तथा बुरी संगत वाले दोस्तों से बच के रहने की कोशिश करेंगे।”इसमें हम सभी लोगों का दोष है” हम बच्चों को मोबाइल, कंप्यूटर आदि देकर बचपन से  या शिशु अवस्था से ही बच्चे को हम लोग अगर अच्छी सीख देते बल्किअपने साथ उठाते बैठाते उनको सही रास्ते बताते उनके साथ लगे रहती तो आज बच्चेंँ की मोबाइल की आदत नहीं होते और खेलकूद व्यायाम से तथा पढ़ाई लिखाई से दूर नहीं होते। हम सब का तो यही कहना है कि हम लोगों को बच्चों के साथ प्यार और मोहब्बत से अच्छा से समझा, बूझकर और उसे अच्छे रास्ते पर लाने का प्रयास करना है। यही हम सभी लोगों का संकल्प है ,पालन-पोषण की कमी तथा नुकसान के लिए हम सब अभिभावक और अध्यापक ही जिम्मेदार है, जिससे बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर इसका गहरा गंभीर परिणाम होता है।
डॉ. अधिकारी ने इस बात पर जोर दिया कि इस महत्वपूर्ण मुद्दे को संबोधित करने के लिए इस वर्ष की विषय वस्तु (थीम )”हमें पालन-पोषण से संकल्पित ” होनी चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि माता-पिता और रिश्तेदार अक्सर अनजाने में बच्चों की तुलना दूसरों से करके और अवास्तविक अपेक्षाएँ रखकर उनके मानसिक स्वास्थ्य का दुरुपयोग करते हैं। यह दबाव बच्चों को छोटा कंप्यूटर , हानिकारक मित्र मंडलियों और यहाँ तक कि नशीली दवाओं की लत में शरण लेने के लिए प्रेरित करता है।
प्रणबानंद इंटरनेशनल स्कूल के कर्मचारियों से बात करते हुए, डॉ. अधिकारी ने अभिभावकों और शिक्षकों से स्कूल जाने वाले बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने का आग्रह किया। उन्होंने स्वस्थ विकास और वृद्धि को बढ़ावा देने वाले पोषण वातावरण को बढ़ावा देने में ,पालन-पोषण के महत्व पर जोर दिया।
१ जून को प्रतिवर्ष मनाया जाने वाला वैश्विक अभिभावक दिवस, बच्चों के जीवन को आकार देने में माता-पिता की महत्वपूर्ण भूमिका की सराहना करने का अवसर प्रदान करता है। डॉ. अधिकारी की समय पर दी गई चेतावनी माता-पिता और देखभाल करने वालों के लिैए सहायक पालन-पोषण प्रथाओं को अपनाने के लिए एक अनुस्मारक के रूप में कार्य करती है, जिससे हमारी भावी पीढ़ियों की भलाई और खुशी सुनिश्चित होती है।
अंत में, डॉ. अधिकारी की अपील वैश्विक समुदाय के साथ प्रतिध्वनित होती है, जो हमें मोबाइल की लत के हानिकारक प्रभावों का मुकाबला करने और हमारे बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देने में  पालन-पोषण के महत्व को पहचानने का आग्रह करती है।

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