रामदेव व्यापार करते हैं, इसलिए वो पापी हैं, एक एजेंडवादी नरेटिव है। -संवेद अनु

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इन दिनों एक नरेटिव खूब चलता है कि बाबा रामदेव व्यापारी हैं संत नहीं,बाबा नहीं।उन्होंने आयुर्वेदिक दवा और योग को बेच कर पाप किया है।
हमारी प्राचीन परंपरा में राजऋषि और स्वतंत्र ऋषि योग और शस्त्र ज्ञान बेचा ही करते थे जो कोई गलत बात न थी,ये अलग बात है कि वे आज के कतिपय या अधिकतर डॉक्टर्स की तरह लुटेरे नहीं थे।
उस समय मुद्रा प्रचलन में नहीं थी तो cash की जगह kind प्राप्त करते थे।द्रोणाचार्य इसके एक उदाहरण हैं।हालांकि वे एक महान शख्शियत थे फिर भी उनके प्रति बड़े सम्मान के साथ कहता हूँ के उन्होंने तो व्यक्तिगत अपमान का बदला लेने के लिए एक राज परिवार से अपनी विद्या का सौदा तक किया।
चाणक्य के जीवन की एक घटना है,जिसमें कोई उनसे व्यक्तिगत काम से रात में मिलने आता है तो वे एक दीपक बुझा कर दूसरा जलाते हैं।पूछने से कहते हैं वे राज्य का काम कर रहे थे तो राज्य के तेल का दीपक जला रहे थे,अब व्यक्तिगत काम करेंगें तो अपना तेल जलाएंगे।इस वाकये का क्या ये अर्थ नहीं निकलता कि वे भी अपनी सेवाओं के बदले मानधन लेते रहे होंगे?जरा सोचिएगा।
गुरु दक्षिणा क्या थी?
महर्षि चरक अपने आश्रम को चलाने के लिए क्या श्रेष्ठी जन और राजाओं से kind प्राप्त नहीं करते होंगे?
तब आश्रम के लिए जमीनें राज्य देता था ,वो क्या था?
किस शास्त्र में लिखा है कि वैद्य औषधि के बदले समाज से कुछ प्राप्त नहीं करते थे?वर्तमान के उपरोक्त नरेटिव के हिसाब से तो वो भी पाप हो गया!
साधु एक प्रवृत्ति का नाम है न कि किसी प्रवचन करने वाले और उपदेश दे कर समाज पर बोझ बनने का।एक राजा भी योगी हो सकता है,एक वैद्य भी साधु हो सकता है,एक राजनीतिक एक्टिविष्ट भी ऋषि हो सकता है,ऐसे उदाहरण हमारे धर्म-ग्रंथों में भरे पड़े हैं।
पतंजलि ने इतना बड़ा ग्रंथ लिखा तो उन्हें सुविधाएं, भोजन तथा शोध के लिए साधन क्या स्वयं भगवान भेजते थे या उन्हें वो सब कुछ समाज से ही प्राप्त होता रहा होगा?विचार कीजिये।
आधुनिक शिक्षा का मतलब अपना विवेक खोना नहीं होता !
रामदेव ने दवा बेच कर कोई पाप नहीं किया है।पाप वो करते हैं जो अस्पताल के कमरे का भाड़ा 10-20 हजार रखते हैं और कमाई हुई आवारा पूंजी अपनी शानदार जीवन-शैली पर खर्च करते हैं।
अधूरा ज्ञान ज्यादा खतरनाक होता है और लोगों में भ्रम फैलाता है…बाकी जो है सो है।
-संवेद अनु

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