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‘शब्दाक्षर’ द्वारा आयोजित ‘सावन के रंग: गीतों के संग’ राष्ट्रीय कवि सम्मेलन में भारत के विभिन्न राज्यों से जुड़ीं कवयित्रियों ने सुनाए एक से बढ़कर एक सुमधुर सावन गीत

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राष्ट्रीय साहित्यिक संस्था ‘शब्दाक्षर’ द्वारा राष्ट्रीय अध्यक्ष रवि प्रताप सिंह के कुशल दिग्दर्शन में आयोजित ‘सावन के रंग : गीतों के संग’ अॉनलाइन राष्ट्रीय कवि सम्मेलन में भारत के विभिन्न राज्यों से आमंत्रित कवयित्रियों ने सावन पर एक से बढ़कर एक स्वरचित रचनाओं/गीतों की सुमधुर प्रस्तुति दी। कार्यक्रम का शुभारंभ शब्दाक्षर दिल्ली की प्रदेश साहित्य मंत्री डॉ. स्मृति कुलश्रेष्ठ द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वंदना ‘हे शारदे माँ, हे शारदे माँ’ तथा कार्यक्रम का संचालन कर रही शब्दाक्षर तेलंगाना की प्रदेश अध्यक्ष ज्योति नारायण के स्वागत वक्तव्य से हुआ। कवि सम्मेलन में शब्दाक्षर की राष्ट्रीय प्रवक्ता-सह-प्रसारण प्रभारी प्रो. डॉ. रश्मि प्रियदर्शनी, प. बंगाल की प्रदेश साहित्य मंत्री अंजू छारिया, संचालिका ज्योति नारायण, संपर्क प्रभारी डॉ. स्मृति कुलश्रेष्ठ, शिल्पी भटनागर, सुशीला चनानी, वंदना चौधरी, सावित्री सुमन, रुपाली सक्सेना के अलावा कवयित्री करुणा झा, मीनाक्षी छाजेड़, स्नेह लता पाण्डेय, सविता बांगड़, ज्योति परशुराम शिंदे, सविता सिंह शमा, मोहिनी गुप्ता, मधु अरोड़ा , साधना मिश्रा, नीलिमा डहेरिया, राजबाला पुंढीर, बिट्टू जैन, कु. गायत्री द्विवेदी, डॉ सुदेश भाटिया, तृप्ति मिश्रा, सुनीता लूला तथा अम्बिका मोदी ने सावन के विभिन्न रूपों एवं प्रभावों को जीवंत कर देने वाली मनमोहक रचनाएँ पढ़ीं।
डॉ. रश्मि प्रियदर्शनी द्वारा प्रस्तुत स्वरचित मुक्तक “हवा बहकी, फ़िज़ा महकी, मचलने लग गया सावन। चहक कर गा उठे बादल, घड़ी आई रुचिर पावन। बिजलियाँ लग गयीं चमचम चमकने श्याम अंबर में। नहा नभनीर से वसुधा, हुई रमणीक मनभावन” तथा प्रसिद्ध सावन-गीत “सुनो सहेली सावन आया, मनमोहक मनभावन आया” की मनमोहक धुन पर श्रोतागण झूम उठे। डॉ. स्मृति कुलश्रेष्ठ की, “कभी गरजे, कभी बरसे, कभी रिमझिम बहारें हैं, कभी काली घटाओं के बड़े दिलकश नजारे हैं, जहाँ तपती है धरती, बरस जाते हैं जम करके, दिखा देते हैं दम अपना, ये बदला कारे-कारे हैं” को काफी वाहवाहियाँ मिलीं। ज्योति नारायण की “शिव की जटा उतर कर यह सावनी है आई, गंगधार बह रही है, यह पावनी है आई”, अंजू छारिया की, “कारे बदरा पानी दे, बरखा आज सुहानी दे”, सावित्री सुमन की “बिन घुंघरू कैसे नाचूँ, सावन भादो आग लगाए”, अंबिका मोदी की “तुझ बिन सूना मेरा सावन कैसे तुझे बताऊँ”, सुशीला चनानी की रिमझिम, रिमझिम मेघा बरसे, सविता बांगड़ की “मोर पपीहा कोयल बोले, धरती का हर कण कण डोले”, करुणा झा की “परदेस बसे बेदर्दी सजना, बदरा उमड़-घुमड़ बरसे अंगना”, सुदेश भाटिया की “सावन की मीठी बयार, चलो सखी बाबुल की गलियाँ” पर खूब तालियाँ बजीं। हरे-हरे वस्त्रों को धारण की हुई महिला गीतकारों ने सरस सावन गीतों, कजरी, शिव महिमा तथा लोकगीतों के मधुर गायन से शब्दाक्षर मंच को भव्य बना डाला। कार्यक्रम का सीधा प्रसारण फेसबुक के “शब्दाक्षर केन्द्रीय पेज” से किया गया।
धन्यवाद ज्ञापन राष्ट्रीय प्रवक्ता-सह-प्रसारण प्रभारी प्रो. डॉ. रश्मि प्रियदर्शनी ने किया। उन्होंने राष्ट्रीय अध्यक्ष रवि प्रताप सिंह के दिग्दर्शन में आयोजित ‘सावन के रंग, गीतों के संग’ कार्यक्रम को शब्दाक्षर की विशिष्ट एवं अनोखी उपलब्धि ठहराया। मनभावन सावन को समर्पित इस काव्यानुष्ठान की सफलता पर शब्दाक्षर केन्द्रीय पेज से जुड़े राष्ट्रीय अध्यक्ष रवि प्रताप सिंह, सत्येन्द्र सिंह ‘सत्य’, दया शंकर मिश्र, सुबोध कुमार मिश्र, निशांत सिंह गुलशन, सागर शर्मा आजाद, पं. बालकृष्ण, प्रो मनोज कुमार मिश्र, महावीर सिंह वीर, श्यामल मजूमदार, राजीव खरे, शशिकांत मिश्र ने हार्दिक खुशी जताई।

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