सतुआन अर्थात सतुआ संक्रांति का महत्व

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भारत में संक्रांति का पर्व बड़े ही उल्लास के साथ मनाया जाता है. किसी भी माह की सूर्य संक्रांति के दिन किया गया दान अन्य शुभ दिनों की तुलना में दस गुना पुण्य देता है. इसी श्रृंखला में आती है वैशाख माह की संक्रांति. इस वर्ष वैशाख संक्रांति के समय सूर्य, 14 अप्रैल, 2022, प्रात:काल 08:39 मिनिट पर मेष राशि में प्रवेश करेंगे.

वैशाख संक्रांति पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र में तुला लग्न में प्रवेश करेगी. इस संक्रान्ति के स्नान, दान आदि का पुण्य़काल दोपहर 15:02 तक होगा. इस मास में प्रतिदिन श्री विष्णु सहस्त्रनाम एवं “ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का पाठ करने का विशेष महत्व होता है.

वैशाख संक्रांति को सतुआ संक्रांति भी कहा जाता है. इस दिन लोग जल से भरा घड़ा, पंखा और सत्तू दान करते और खाते हैं. वैशाख मास में नित्यप्रति प्रात: काल सूर्योदय से पूर्व शुद्ध जल में स्नान करने, तीर्थाटन करने, यथाशक्ति अनाज, वस्त्रों, फलादि का दान करने का विधान व महत्व कहा गया है. यह विधान करने वाले व्यक्ति के जीवन से रोग-शोक दूर होते है. आरोग्य, धन, सम्पदा इत्यादि सुखों की प्राप्ति होती है. यह तन-मन और आत्मा को शक्ति प्रदान करता है. इस समय पवित्र नदियों में स्नान और दर्शन सभी पुण्यदायक फल प्रदान करने वाला माना गया है.

वैशाख संक्रांति पूजा
संक्रांति व्रत का विशेष महत्व होता है. वर्ष में क्रमानुसार आने वाली प्रत्येक संक्रांति को व्रत उपवास आदि का पालन करना चाहिए. संक्रांति समय स्नानादि से निवृत्त होकर भगवान की मूर्ति स्थापित करके गणेश एवं अन्य देवताओं का पूजन करके सूर्य नारायण भगवान का षोडशोपचार पूजन, संकल्पादि कृत्यों के साथ पूजन करना चाहिए. यह पूजा विधि क्रम का नाश करने में सहायक है. सुख-संपत्ति, आरोग्य, ज्ञानादि की प्राप्ति होती है और शत्रुओं का मान-मर्दन होता है.

संक्रांतियों में उपवास तथा स्नान करने मात्र से व्रती प्राणी संपूर्ण पापों से छुटकारा पा लेता है. धर्म ग्रंथों के अनुसार स्वयं ब्रह्माजी ने कहा है कि वैशाख संक्रांति भगवान विष्णु को प्रसन्न करने वाली है. वैशाख संक्रांति में केवल जलदान करके ही कई गुना शुभ फल प्राप्त किए जा सकते हैं.

वैशाख संक्रांति महत्व
हिन्दु पंचाग के अनुसार वैशाख मास वर्ष का दूसरा माह होता है. मान्यता है कि इस समय भगवान की पूजा, ध्यान और पवित्र कर्म करना बहुत शुभ होता है. भगवान का स्मरण इस काल में बहुत पुण्य देता है. वैशाखी संक्रांति के दिन तिलों से युक्त जल से व्रती लोग स्नान करते हैं. अग्नि में तिलों की आहुति देते हैं, मधु तथा तिलों से भरा हुआ पात्र दान में भी दिया जाता है. इसी प्रकार के महत्वपूर्ण विधि-विधान का विस्तृत विवरण धर्म ग्रंथों में दिया गया है.

हिन्दू पंचांग अनुसार वैसाख संक्रांति धार्मिक और लोक मान्यताओं में बहुत ही शुभ है. वैशाख संक्रांति में काशी कल्पवास, नित्य क्षिप्रा, स्नान-दान, दर्शन, सत्संग, धर्म ग्रंथों का स्मरण, संयम, नियम, उपवास आदि के संकल्प के साथ तीर्थवास का महत्त्व होता है. वैशाख संक्रांति के उपलक्ष पर प्रति वर्ष हज़ारों की संख्या में श्रद्धालु महादेव का आशीर्वाद प्राप्त कर पुण्य कमाते हैं.

वैशाख संक्रांति पर रखें इन नियमों का ध्यान
वैशाख संक्रान्ति के समय पर कई सारे धार्मिक कृत्य किए जाते हैं. इस मास के दौरान मौसम में गर्माहट अधिक होने लगती है. इस स्थिति में मौसम के इस रुप और बदलाव को लेकर धार्मिक स्वरुप में भी कई नियम बताए गए हैं जो न केवल धर्म ही नहीं अपितु वैज्ञानिक तर्क की कसौटी पर भी खरे उतरते हैं.

इस महीने में गरमी की मात्रा लगातार तीव्र होती जाती है और कई प्रकार के संक्रमण और रोग भी बढ़ने लगते हैं. इस लिये इस संक्रान्ति समय पर किए गए खान पान एवं पूजा पाठ से इन सभी समस्याओं से बचाव होता है.

संक्रांति पर किया जाता है जल का दान इस समय पर स्थान स्थान पर लोगों के लिए पानी की व्यवस्था की जाती है. जिससे सभी का कल्याण एव विकास संभव हो सके. इस मौसम में मसाले एवं तामसिक भोजन का त्याग करना चाहिए. अधिक तेल और मसाले वाली चीजों को खाने से बचना चाहिये.

इस मौसम में जितना संभव हो सके रसदार फलों का सेवन करना चाहिये व पानी की अधिक मात्रा को ग्रहण करना चाहिये. इस मौसम में सत्तू के उपयोग पर भी अधिक बल दिया जाता है. अपनी दिनचर्या में शुद्धता एवं सरलता का असर डालना चाहिये. इस मौसम में अधिक समय तक सोने से भी बचना चाहिये. दिन में सोने की समय सीमा को कम करने की कोशिश करनी चाहिये.

वैशाख संक्रांति में पूजा पाठ और नियम

वैशाख संक्रांति के दिन प्रात:काल उठ कर अपने ईष्ट का ध्यान करना चाहिये. प्रयत्न करना चाहिये कि सदैव ही इस माह में सूर्योदय के पूर्व उठ कर ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कार्य संपन्न कर लिया जाए. जल में तिल डाल कर भी स्नान किया जा सकता है. भगवान श्री हरि का नाम स्मरण करना चाहिये. गंगा नदी, सरोवर या शुद्ध जल से स्नान करने के बाद शुद्ध साफ वस्त्र धारण करके भगवान का पूजन करना चाहिये. शिवलिंग पर जलाभिषेक करना चाहिये. इसके बाद संक्रांति के महात्मय का भी पाठ करना चाहिये.

संक्रान्ति के समय सूर्य उपासना का महत्व बहुत होता है. इस समय सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है, इसलिए इस समय के दौरान सूर्य पूजन करना अत्यंत महत्वपूर्ण होता है. यह सौर मास का आरंभ समय भी होता है. सूर्य को जल चढ़ाना चाहिये और सूर्य की पूजा करनी चाहिये. आदित्यहृदय स्त्रोत का पाठ करना चाहिये और सूर्य के नामों को स्मरण करना चाहिये.

धर्म ग्रंथों का पाठ अवश्य करना चाहिये. संक्रांति समय भागवत कथा का पाठ करना चाहिये. भगवान को मौसम अनुकूल फल-फूल अर्पित करने चाहिये. संक्रान्ति के पुण्यकल समय दान एवं पूजा का कार्य अवश्य करना चाहिये.

वैशाख संक्रांति महात्म्य

संक्रांति अर्थात एक संचरण होना . प्रकृति के एक बदलाव का रुप संक्रांति भी है. इस अवसर पर सूर्य का राशि परिवरत्न होना सौर वर्ष के लिहाज से अत्यंत ही महत्वपूर्ण होता है. इसी के साथ ये बदलाव मौसम पर भी अपना असर अवश्य छोडता है. ऎसे में वैशाख संक्रांति का दिन सृष्टि में मौजूद सभी जीवों पर अपना प्रभाव भी डालता है. इसलिए इस दिन सूर्य उपासना का महत्व बहुत होता है और इस संक्रांति के दिन किये गए दान पुण्य का फल अंजाने में किये गए पापों की शांति करता है और साथ ही शारीरिक मानसिक आध्यात्मिक मजबूती देता है. पुराणों में संक्रांति के दिन किए गए दान और स्नान द्वारा सहस्त्रों यज्ञों के करने के समान फल प्राप्त होता है.

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