राष्ट्रीय कृमि मुक्ति दिवस – स्वस्थ राष्ट्र के निर्माण की दिशा में निर्णायक पहल
– ई0 प्रभात किशोर बच्चे किसी भी राष्ट्र के भविष्य होते हैं। परन्तु बच्चों की जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा कृमि संक्रमण से पीड़ित है, जो उनके स्वास्थ्य, शिक्षा और समग्र कल्याण को कुप्रभावित करता है। बच्चों में कृमि संक्रमण की व्यापकता की ज्वलंत समस्या से निबटने हेतु भारतवर्ष में एक राष्ट्रव्यापी अभियान के रूप में राष्ट्रीय कृमि मुक्ति दिवस का आयोजन किया जाता है। यह महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्वास्थ्य पहल युवा पीढ़ी के लिए एक स्वस्थ भविष्य सुनिश्चित करती है। 1 से 19 वर्ष की आयु के बच्चे अपनी जीवनशैली और पर्यावरण के कारण कृमि संक्रमण के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। परजीवी कृमि संक्रमण, विशेष रूप से मृदा संचारित कृमि (एसटीएच) के चक्र को भेदने हेतु राष्ट्रव्यापी योजनाबद्ध हस्तक्षेप आवश्यक है। मृदा संचारित कृमि (एसटीएच) कृमि पोषक तत्वों के अवशोषण में बाधा डालते हैं और शारीरिक परेशानी पैदा करते है । इसके परिणामस्वरूप एनीमिया, कुपोषण और मानसिक और शारीरिक संज्ञानात्मक विकास में बाधा उत्पन्न होती है, जो बच्चों के शैक्षिक प्रदर्शन के साथ-साथ जीवन की गुणवत्ता को भी गंभीर रूप से प्रभावित करती है। कृमि मुक्ति से बच्चों में कृमि संक्रमण में उल्लेखनीय कमी आती है। इससे उनके शारीरिक स्वास्थ्य और पोषण की स्थिति में सुधार होता है और मस्तिष्क पर कृमियों के हानिकारक प्रभाव समाप्त होते हैं, जिससे सीखने की क्षमता और शैक्षणिक प्रदर्शन में सुधार होता है। बच्चों के बेहतर स्वास्थ्य से विद्यालय में नामांकन, ठहराव और शिक्षा की गुणवत्ता में भी सकारात्मक प्रभाव परिलक्षित होते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, भारतवर्ष में 1 से 14 वर्ष की आयुवर्ग के 24 करोड़ 10 लाख बच्चे परजीवी आंतों के कृमियों से संकटग्रस्त हैं। नियमित कृमि मुक्ति से संकटग्रस्त आबादी की रक्षा होती है। आमजन को कृमि संक्रमण के लक्षणों के बारे में पता होना चाहिए, ताकि समय पर इसका इलाज करवाकर बेहतर स्वास्थ्य सुनिश्चित किया जा सके। प्रारम्भ में कतिपय कृमियों के मामले में, कोई स्पष्ट ध्यातव्य लक्षण दिखाई नहीं देते हैं, परन्तु जैसे-जैसे कृमि संक्रमण बढ़ता है, दस्त, पेट दर्द, कमजोरी एवं थकान, भूख न लगना, पोषण संबंधी कमियाँ, त्वचा संबंधी समस्याएँ, पाचन संबंधी परेशानियाँ आदि होने लगती हैं। परजीवी कृमि संक्रमण में बढ़ोतरी नागरिकों के स्वास्थ्य के प्रति सार्वजनिक चिंता का विषय है और इसे कुछ सामान्य सामुदायिक प्रयासों से भी कम किया जा सकता है, यथा- खुले में शौच से बचना, नंगे पैर नहीं घूमना, खाने के पूर्व फलों /सब्जियों को धोना, मांस/ सब्जियों को ठीक से पकाना, कच्चा स्ट्रीट फूड खाने से परहेज करना, रसोई को साफ-सुथरा रखना, उपचारित /उबला हुआ पेयजल सेवन करना, नाखूनों को साफ रखना, खेलने एवं बागवानी करते समय मिट्टी के संपर्क में आने के बाद हाथ धोना आदि । स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार के द्वारा 10 फरवरी 2015 को राष्ट्रीय कृमि मुक्ति दिवस (एनडीडी) का शुभारंभ किया गया। यह दिवस स्वास्थ्य कर्मियों के उन्मुखीकरण, विद्यालय जाने वाले बच्चों को कृमि मुक्ति एल्बेंडाजोल गोलियों के वितरण व सेवन और इसकी उचित निगरानी एवं मूल्यांकन के लिए राष्ट्रव्यापी प्रभावी दृष्टिकोण को तेज करने हेतु वर्ष में दो बार क्रमशः 10 फरवरी एवं 10 अगस्त को मनाया जाता है। राष्ट्रीय कृमि मुक्ति दिवस का उद्देश्य आंगनवाड़ी केन्द्रों और विद्यालयों के माध्यम से 1-19 वर्ष आयु वर्ग के सभी प्री-स्कूल और विद्यालय जाने वाले बच्चों (नामांकित और अनामांकित) को कृमि मुक्त करना है ताकि उनके समग्र स्वास्थ्य, पोषण की स्थिति, शिक्षा तक पहुंच और जीवन की गुणवत्ता में सुधार हो सके। एल्बेंडाजोल की गोलियां उन बच्चों को नहीं दी जाती हैं जिन्हें इससे एलर्जी है। साथ हीं गंभीर रूप से बीमार बच्चों, गर्भवती महिलाओं, स्तनपान कराने वाली महिलाओं को भी इसके सेवन से दूर रखा जाता है। राष्ट्रीय कृमि मुक्ति दिवस विद्यालय जाने वाले बच्चों को परजीवी कृमि संक्रमण से बचाने हेतु एक महत्वपूर्ण दिवस है, जिसमें एल्बेंडाजोल की गोलियां दी जाती हैं और विद्यालय के शिक्षको एवं अन्य कर्मचारियों को बच्चों द्वारा इसके नियमित उपयोग के लिए उन्मुखीकरण और मार्गदर्शन किया जाता है। इस महत्वपूर्ण पहल से देश के बच्चों का उज्ज्वल एवं स्वस्थ भविष्य का मार्ग प्रशस्त होगा और राष्ट्र “एनीमिया मुक्त भारत” की दिशा में अग्रसर होगा। (लेखक अभियंता और शिक्षाविद् हैं।)