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अनुच्छेद 370: विवाद से विश्वास तक —सूर्य प्रकाश अग्रहरि

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आलेख- सूर्य प्रकाश अग्रहरि
(लेखक महाराजा सुहेलदेव राज्य विश्वविद्यालय, आज़मगढ़ में अतिथि प्रवक्ता हैं)
17 अक्तूबर, 1949 को अनुच्‍छेद 370 भारतीय संव‍िधान का ह‍िस्‍सा बना तथा इसे एक ‘अस्थायी प्रावधान’ के रूप में जोड़ा गया था, जिसने जम्मू-कश्मीर को छूट दी थी, ताकि वह अपने संविधान का मसौदा तैयार कर सके और राज्य में भारतीय संसद की विधायी शक्तियों को प्रतिबंधित कर सके। यह संविधान के प्रारूप में अनुच्छेद 306 (ए) के तहत एन. गोपालस्वामी अय्यंगार द्वारा प्रस्तुत किया गया था। इस प्रस्ताव का सिर्फ एक सदस्य ने विरोध किया था और वह थे इंकलाब जिंदाबाद का नारा देने वाले मौलाना हसरत मोहानी। मोहानी ने इस प्रस्ताव के खिलाफ वोट डालते हुए कहा था कि जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देना दूसरे राज्यों के साथ भेदभाव है, उन्होंने सवाल उठाया था कि यह भेदभाव क्यों किया जा रहा है? अनुच्छेद 370 ने जम्मू-कश्मीर को एक अलग संविधान, एक राज्य ध्वज और आंतरिक प्रशासनिक स्वायत्तता रखने का अधिकार दिया था। इसी के साथ अनुच्छेद 35(ए) भी अनुच्छेद 370 से उपजा है और जम्मू-कश्मीर संविधान सभा की सिफारिश पर 1954 में राष्ट्रपति के एक आदेश के माध्यम से लागू किया गया था। अनुच्छेद 35(ए) जम्मू-कश्मीर विधायिका को राज्य के स्थायी निवासियों और उनके विशेषाधिकारों को परिभाषित करने का अधिकार देता है।
*श्यामा प्रसाद मुखर्जी और कश्मीर-*
जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का सपना जम्मू-कश्मीर को एकीकृत करने का था, जिसमें उन्होंने नारा दिया था, ‘एक देश में दो निशान, दो विधान और दो प्रधान नहीं हो सकते।’ सन् 1953 में डॉ. मुखर्जी जम्मू-कश्मीर की यात्रा पर निकले लेकिन जम्मू-कश्मीर सरकार ने राज्य में प्रवेश करने पर डॉ. मुखर्जी को 11 मई 1953 को हिरासत में ले लिया जिसका कारण था परमिट न होना। पहले यह व्यवस्था थी कि अगर आपको जम्मू-कश्मीर जाना है तो इसके लिए परमिट लेना पड़ता था। कुछ समय बाद 23 जून 1953 को जेल में उनकी रहस्यमयी मौत हो गई।बताया जाता है कि जेल में उनको प्रताड़ित किया गया। कश्मीर जैसे ठंडे प्रदेश में उनको गर्म कपड़े तक नहीं दिए गए। उनको एक खुले बरामदे में रखा गया। डॉ. मुखर्जी की मौत के साथ ही जम्मू-कश्मीर में परमिट व्यवस्था भी समाप्त हो गयी थी।
*अनुच्छेद 370 के अंत की पटकथा-*
सही मायने में 20 दिसंबर 2018 को जब जम्मू कश्मीर में संविधान के अनुच्छेद 356 के तहत प्रदत्त शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए राष्ट्रपति शासन लागू किया गया और इसे 3 जुलाई 2019 तक के लिए बढ़ाया गया था तभी से ही अनुच्छेद 370 के अंत की पटकथा लिखने की शुरुआत हो गयी थी। एक महीना बीता ही था कि 5 अगस्त 2019 केंद्र ने पूर्ववर्ती राज्य जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त कर दिया और दो केंद्रशासित प्रदेशों के गठन किया- जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख। अगले ही दिन जम्मू कश्मीर के वकील शाकिर शबीर के साथ शामिल हुए एक अन्य वकील एमएल शर्मा ने अनुच्छेद 370 को हटाए जाने के राष्ट्रपति के आदेश को चुनौती देते हुए पहली याचिका दायर की। इसके बाद नेशनल कॉन्फेंस आदि ने भी याचिकाएं दायर की। याचिकाकर्ताओं द्वारा ‘कलरेबल लेजिस्लेसन’ के सिद्धांत को सामने रखा था जिसके तहत ‘जो प्रत्यक्ष रूप से नहीं किया जा सकता,’ वह अप्रत्यक्ष रूप से नहीं किया जा सकता। इसके अलावा याचिकाकर्ताओं का कहना था कि राष्ट्रपति ने जम्मू कश्मीर की संवैधानिक सभा की सहमति के बगैर अनुच्छेद 370 में अप्रत्यक्ष रूप से संशोधन किया है। 28 अगस्त 2019 को तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अगुवाई वाली पीठ ने मामले को पांच सदस्यीय संविधान पीठ को भेजा। दो अगस्त 2023 से उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 370 को निरस्त किए जाने को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर नियमित सुनवाई शुरू की। 5 सितंबर 2023 को अदालत ने 23 याचिकाओं पर 16 दिन तक सुनवाई करने के बाद मामले पर फैसला सुरक्षित रखा। अंततः 11 दिसंबर 2023 को उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 370 को निरस्त किए जाने के सरकार के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि केंद्र शासित प्रदेश में विधानसभा के लिए चुनाव अगले साल 30 सितंबर तक कराया जाए।
*मुख्य प्रश्नों पर संवैधानिक पीठ का निर्णय-*
11 दिसंबर 2023 को सर्वोच्च न्यायालय की पांच न्यायाधीशों की संवैधानिक पीठ ने कहा कि जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने का फैसला युद्ध जैसी स्थिति में तदर्थ उपाय के रूप में किया गया था। वह स्थायी व्यवस्था नहीं थी। जम्मू कश्मीर के ‘विशेष दर्जे’ के प्रश्न पर न्यायालय ने कहा कि रियासत के पूर्व शासक महाराजा हरि सिंह ने घोषणा की थी कि वह अपनी संप्रभुता बरकरार रखेंगे। उनके उत्तराधिकारी करण सिंह ने घोषणा की कि भारतीय संविधान राज्य में लागू होगा। अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि जम्मू और कश्मीर हमेशा भारत का अभिन्न अंग रहा है। पीठ ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद एक और 370 के अलावा, जम्मू-कश्मीर संविधान नको की धारा तीन का भी हवाला दिया। पीठ के सामने मुख्य प्रश्न अनुच्छेद 370 की स्थिति को लेकर था जिसके संबंध में पीठ ने कहा कि यह एक अस्थायी प्रावधान है। प्रधान न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने शाब्दिक दृष्टिकोण अपनाया और अनुच्छेद 370 को शामिल करने और अस्थायी प्रावधानों से संबंधित संविधान के भाग 21 में अनुच्छेद 370 को रखने के लिए ऐतिहासिक संदर्भ के साक्ष्य का हवाला दिया। एक अन्य संदर्भ अनुच्छेद 370 को खत्म करना संबंधित था जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त 2019 की राष्ट्रपति की दोनों घोषणाओं को बरकरार रखा। मुख्य कानूनी चुनौती 2019 में राष्ट्रपति की दो उद‌घोषणाओं को लेकर थी, जिसने वास्तव में अनुच्छेद 370 को निरस्त कर दिया था। मुख्य मुद्दा यह था कि क्या राष्ट्रपति शासन के अधीन होने पर राज्य की शक्तियां संभालने वाले संघ द्वारा ये कार्रवाई की जा सकती है।
*जम्मू-कश्मीर के प्रति मोदी सरकार का दृष्टिकोण-*
दशकों से जम्मू-कश्मीर के साथ भारत के अन्य राज्यों से अलग व्यवहार किया जाता था। जिसकी मुख्य वजह अनुच्छेद 370 से उपजे इस राज्य की मुख्यधारा से दूरी थी। अनुच्छेद 370 की वजह से भारतीय संविधान की अधिकांश धाराएं जम्मू कश्मीर पर लागू नहीं होती थी। जम्मू-कश्मीर में विकास संबंधित इन बाधाओं को दूर करने की मोदी सरकार की दीर्घकालिक सोच की वजह से ही 5 अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 और अनुच्छेद 35ए को निरस्त कर दिया गया था। तब केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने इसे ‘ऐतिहासिक भूल को ठीक करने वाला ऐतिहासिक कदम’ कहा था। पहले देश के लिए अधिकतर योजनाएं एवं कानून जो बनते थे, उनमें लिखा होता था ‘जम्मू-कश्मीर को छोड़कर’ लेकिन अब ये इतिहास की बात हो चुकी है। शांति और विकास के मार्ग पर आगे बढ़ता हुआ कश्मीर अनेक क्षेत्रों में संभावनाओं के मार्ग खोल रहा है। पिछले चार वर्षों में ही पर्यटन उद्योग, औद्योगिक क्षेत्र, स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि या सड़क संपर्क, हर क्षेत्र में उल्लेखनीय काम हुआ है। सरकारी योजनाओं का लाभ हर नागरिक तक पहुंच रहा है। सभी सरकारी सेवाएं आनलाइन हो चुकी हैं। कभी पत्थरबाजी और अलगाववाद से ग्रस्त रहे क्षेत्र आज विकास की नई बुनियाद का निर्माण कर रहे हैं। चाहे युवाओं को शिक्षा हो या फिर युवाओं को रोजगार, मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के युवाओं के लिए अपार संभावनाओं को विकसित करने का मार्ग प्रशस्त किया है। अगले वर्ष तक कश्मीर को देश से रेल सेवा से जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है। देश की महत्वाकांक्षी ऊधमपुर-श्रीनगर-बारामुला रेल लिंक परियोजना अपने अंतिम चरण में है। जम्मू-कश्मीर के दूरदराज क्षेत्रों तक सड़क संपर्क बहाल करने के लिए युद्धस्तर पर कार्य किया जा रहा है। वाल्मिक समुदाय, गोरखा लोगों और पश्चिमी पाकिस्तान से उजाड़े और खदेड़े गए लोगों को राज्य में पहली बार होने वाले चुनाव में मतदान का अधिकार मिला। पेयजल-बिजली कनेक्शन से लेकर जन्म-मृत्यु प्रमाणपत्र के लिए जम्मू-कश्मीर में 1100 सेवाए डिजिटल मोड पर उपलब्ध है। ई-आफिस प्रणाली लागू होने से दरबार मूव के नाम पर खजाने पर पड़ने वाले करोड़ों रुपये के बोझ से मुक्ति मिल चुकी है। चार वर्षों में प्रदेश में 73,376 करोड़ रुपये से अधिक के निवेश के प्रस्ताव आए हैं। इससे 3.5 लाख युवाओं को रोजगार मिलने की संभावना है। वित्तीय वर्ष 2022-23 में 2153 करोड़ का निवेश हुआ। इसमें 500 करोड़ की एफडीआइ है, जिसके तहत श्रीनगर में एक शापिंग माल और श्रीनगर व जम्मू में एक-एक आइटी टावर का निर्माण होना है। 2014 से 2019 के बीच मोदी ने जम्मू- कश्मीर की 18 यात्राएं कीं। इनमें सिर्फ सात दौरे ही चुनावी उद्देश्य के लिए थे। पीएम ने लद्दाख में भी पर्याप्त समय देते हुए वहां की जनता से जुड़ाव मजबूत किया। इसके अलावा केंद्र सरकार के वरिष्ठ मंत्रियों के जम्मू- कश्मीर के निरंतर दौरों ने भी सरकार की छवि मजबूत की। मई 2014 से मार्च 2019 तक केंद्रीय मंत्रियों के 149 दौरे राज्य में हुए। मंत्रियों ने जनता से सीधा संवाद शुरू कर मध्यस्थता वाली परंपरा को समाप्त किया।
*आगे की चुनौतियाँ-*
धरती का स्वर्ग कहे जाने वाले जम्मू-कश्मीर को भारत की स्वतंत्रता के बाद से ही राजनैतिक चश्मे से देखा जाता था। बाधाओं की जंजीर में जकड़े जम्मू-कश्मीर को वर्तमान की मोदी सरकार ने मुक्त कराने का कार्य किया है। निस्संदेह अनुच्छेद 370 के समाप्त होने से जम्मू-कश्मीर विकास की मुख्यधारा में वापस आ गया है और वहाँ सक्रिय अलगाववादी और आतंकवादी ताकतों को मुँह की खानी पड़ी है। यह अनुच्छेद केवल अलगाववाद का जरिया नहीं था वरन जम्मू-कश्मीर के वंचित वर्गों के अधिकारों का निर्ममता से दमन करने वाला भी था। परंतु मुख्य प्रश्न यह है कि इतने दशकों से अलगाववाद का दंश झेल रहे जम्मू-कश्मीर के लिए आगे का रास्ता क्या है? हमें यह अवश्य ध्यान देना चाहिए कि अभी भी कश्मीर से संबंधित भारत विरोधी नैरेटिव फैलाने वाले एक तंत्र कार्य कर रहा है और इसके साथ-ही-साथ पीओजेके भी एक नासूर बना हुआ है। वर्तमान में पीओजेके के लिए विधानसभा में 24 सीटें रखी गयी हैं। 2020 में केंद्र सरकार ने जिला विकास परिषदों (डीडीसी) और पंचायत के चुनाव करवाए, लेकिन यह निकाय फिलहाल काफ़ी कमज़ोर दिखाई पड़ते है, जिन्हें काफी ज्य़ादा सशक्त बनाने और मार्गदर्शन की आवश्यकता है। कट्टरता की चुनौती से निपटने के लिए भारत को सूचना तकनीक पर ध्यान देने की जरूरत है क्योंकि कश्मीर के भीतर और बाहर से चलाए जा रहे इंफॉर्मेशन वॉरफेयर ने इसको और भी जटिल बना दिया है। टेरर फंडिंग, हाइब्रिड आतंकवाद, नारकोटिक्स आदि देश विरोधी गतिविधियों के माध्यम से सदैव से ही कश्मीर को अस्थिर रखने की कोशिस की गई है। आने वाले समय में अस्थिरता की स्थिति न उत्पन्न होने पाए इसके लिए भारत सरकार को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जरिये सूचना तंत्र को मजबूत करने पर ध्यानाकर्षित करना होगा।

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