कहानी : ” बनारसी साड़ियां “

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कहानी : " बनारसी साड़ियां "

— मनोज कुमार ओझा

आधी रात बीतने को है, और मैं फेसबुक पर बैठा लिख रहा हूँ, जाहिर है न तो कमैंट्स की अभिलाषा है न लाइक्स पाने की ललक. बस मन को हल्का करने के लिये लिख रहा हूँ. वैसे भी अब मेरी जिंदगी मेँ है ही क्या जो आपलोग मुझे लाइक करें और मुझसे बातें करें. हे भगवान मुझे मौत दे दो. जानता हूँ माँगे मुँह मौत भी नहीं मिलती पर ये दिल नहीं मानता. अब जीने का अर्थ भी क्या है.

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पुरे शहर का एटीएम या तो बंद पड़ा है या उसमे पैसे नहीं है. पर पैसा तो चाहिए. घर का राशन लाना है, आज महीने के छह तारीख हो गए. अख़बार का बिल, बिजली का बिल, दूध वाले का हिसाब. रिंकी का परसों से एग्जाम है स्कूल का ड्यूज देकर उसका एडमिट कार्ड लाना है. सोनू का पीओ का बैंक का एग्जाम है गुवाहाटी, ट्रेन की टिकट बनवानी है, होटल बुक करना है.

अब बस एक ही एटीएम बचा है जो शहर के ऑउटस्कर्ट्स मेँ है चलूँ वहाँ देख लूँ.

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जाने मेँ तो खूब जल्दी की. पर पैसा निकाल कर धीमी गति मेँ बाइक चला लौटने लगा. आज तेईस साल बाद इधर आया हूँ. मुझे ठीक -ठीक याद है 1999 मेँ अपने शादी के दो सप्ताह बाद आया था ईधर रामसुख रजक के पास डॉली की बनारसी साड़ियां लेकर. रामसुख मेरी ही उमर का था, साड़ियों का हाथ मेँ लेकर कहा, ” नया बना दूंगा. देखना. परी मिली है परी मैं कपड़े का कलर देखकर दुल्हन का डौल बताये देता हूँ. अब उसका होकर रहना, कोई कहे की, चल, तो मत चल देना. ”
मैं मुस्का कर उसे दुत्कारा, ” आ भाग रे, ऐसा मैं कब था रे. ”
साड़ियां चमक गई थीं उसके हाथों मेँ आकर.
मैं अतीत की यादों मेँ खोया चला जा रहा था.

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” प्रेम ,ऐ प्रेम , आरे रुक, रामसुख को भूल गया क्या रे ? ”
मैंने बाइक रोकी और पीछे मुड़कर देखा, हाँ यह रामसुख ही था. उसके घर के चारों ओर बड़े -बड़े मकान खड़े हो गए थे. उसका वही पुराना बांस का घर. मैं लौटा उसकी ओर. उम्र की रेखाएं उसके चेहरे पर झलकने लगी थी.
” बैठ -बैठ, मुस्कुरा कर कहा. ”
” ये क्या हालत बना रखी है अपनी. ” उसने मुझे उलाहना दिया.
” अब वो नहीं रही तो किस पर बनु-ठनु रे.. ” मैंने कहा.
” कौन बनारसी साड़ी वाली ! ”
” हाँ रे,” इससे अधिक मुझसे कहा न गया.

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उस काली रात ने सब कुछ लूट लिया. गर्मी की छुटियाँ मना कर हम पटना लौट रहे थे. रिंकी गोद मेँ थी. सोनू नौ साल का था. अचानक बस पलटी और गंगा जी मेँ जा गिरी. होश आया तो बस इतना याद है उसने बच्चों को गोद मेँ दें कहा, ” आप मुझसे बहुत प्यार करते है न ”
” हाँ रे पगली, तुझे कुछ नहीं होगा. ” उसके सिर से ख़ून बह रहा था.
” तो एक वादा कीजिये, आप दूसरी शादी नहीं करेंगे. ” वह रूकती हुई साँसो से दोनों बच्चों को गोद मेँ रखकर एक तरफ गिर गई.
उसके हाथ अपने हाथ मेँ लेकर मै वादा करता रहा तब तक जब तक मैं दुबारा बेहोश न हो गया.

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आज बहुत देर उसका फोटो हाथ मेँ लेकर रोता रहा.
” देख, ऐ बनारसी साड़ी वाली, मैंने शादी नहीं की. देख तेरे बच्चे आज कितने बड़े हो गए हैँ की मैं तेरे पास आ जाऊं तो भी वो जी लेंगे, जी लेंगे रे. ”
” पापा, पापा, आप हमें छोड़ कर कहाँ जायेंगे. ”
दोनों बच्चे अपने अपने कमरे से निकल कर कब मेरे पास आ मुझसे लिपट कर रोने लगे थे मुझे अब होश आया.

” कहीं नहीं जाऊंगा बेटे, कहीं नहीं, कहीं नहीं, सो जाओ, तुमलोग आज यहीं मेरे साथ सो जाओ. ” मैं जैसे भावनाओं के ज्वार मेँ बह रहा था.

दोनों सोये हैँ, मेरे दाहिने बांये, मैं बनारसी साड़ी वाली की फोटो देखकर कहता हूँ — देख रे, आज मैंने दूसरा वादा किया, बच्चों से. ”

मैं देख रहा हूँ – वो मुस्करा रही है मुझे देखकर. अब मेरे जीने का अर्थ है.
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9678092695, 8011172186
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