कही हज़ारो मे मिलते, दो चार है हमलोग।।

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कभी शाख मे है तो कभी जड़ मे है हमलोग,
कही हज़ारो मे मिलते, दो चार है हमलोग।।
यूँ तो मिलते नहीं काश ढूंढ़ने से भी कभी
कभी मिल जाते है आँगन मे टहलते हुए हमलोग।।
हम कौन है और किस वजह से है, क्या बताये
कभी यूँ ही बेवजह ज़िन्दगी जी लेते है हमलोग।।
हम कोई और नहीं है, आशिको के काफ़िले है,
जहाँ कोई नहीं मिलता, उस जगह मिलते है हमलोग।।
चाहते है किसी एक को हद से ज़्यादा ज़िन्दगी भर,
बस किसी की चाहत नहीं बन पाते हमलोग।।
कभी रांझा, कभी मजंनू, कभी महीवाल भी बने
आज कल हर दूसरे इंसान मे मिलते है हमलोग।।
अक्सर कोई याद तो वैसे करता नहीं है, हमें कभी
बस जनाज़े के वक़्त ही याद आते है हमलोग।।
ज़िन्दगी और मौत दोनों ही गुमनाम होती है हमारी,
ना जला के चैन है, और ना दफनाते बनते है हमलोग।।

देवाशीष दास
एनआईटी शिलचर

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