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धम्मपद्द अपमादवग्गो~१२ सूत्र- अंक~३५ — आनंद शास्त्री

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प्निय मित्रों ! नित्यसत्यचित्त बुद्धमुक्त पदऽस्थित तथागत महात्मा बुद्ध द्वारा उपदेशित-“धम्मपद्द” के भावानुवाद अंतर्गत स्वकृत बाल प्रबोधिनी में अपमादवग्गो के बारहवें पद्द का पुष्पानुवाद उनके ही श्री चरणों में निवेदित कर रहा हूँ–
“अप्पमादरतो भिक्खु पमादे भयदस्सि वा ।
अभब्वो परिहानाय निब्वाणस्सेव सन्तिके ।।१२।।”
अपमादवग्गो के इस अंतिम पद्द को मैं आपके समक्ष प्रस्तुत करता हूँ ! इस पद्द में तथागतजी कहते हैं कि-“अप्पमादरतो भिक्खु पमादे भयदस्सि वा”अब बताते हैं कि इस प्रकार आत्मस्वरूप में स्थितप्रज्ञ भिक्षु निरन्तर प्रमादों से विलग और उनमें भय देखने के कारण अपने सम्पूर्ण दुःख-सुख की हानि कर देता है।
अर्थात वह निर्वाण के सन्निकट पहूँच जाता है ! इस सम्पूर्ण अपमादवग्गो नामक धम्मपद के अध्याय में तथागतजी ने येन-केन प्रकारेण प्रमाद से दूर होना ही अप्रमाद में स्थित होने का हेतु है यही सिद्धांत स्थापित किया है।
अब मैं इस समूचे पद्द के अंतर्गत कुछ यक्ष प्रश्नों की तरफ आपका ध्यान आकर्षित कराना चाहता हूँ–मैं समझता हूँ कि”बौद्ध, जैन,सिक्ख,ओशो,वैष्णव, शैब्य,शाक्त,कबीर,वाम, गाणपत्य,शाक्त्य आदि जितने भी विचार हैं ये एक ही विचार और अर्थ की पूष्टी करते हैं-
इन सभीका लक्ष्य परमार्थ तत्व की प्राप्ति के अतिरिक्त अन्य कुछ हो भी नहीं सकता ! और वेद,उपनिषद,शास्त्र, मानस, धम्मपद,गुरू गृंथ साहिब, आगम,बीजक या फिर तांत्रिक कक्षा के उच्चकोटि के गृंथ ये पौरूषेय हैं अथवा अपौरूषेय ये बात महत्व रखती ही नहीं ! महत्व तो इनके मूल उद्रेश्य का होता है न।
मैं कभी-कभी आश्चर्य चकित एवम् किंकर्तब्य विमूढ सा हो जाता हूँ,जब इन मतों अथवा श्रेष्ठतम् गृंथों अथवा महापुरूषों पर किन्ही सम्प्रदायवादी अथवा भिन्न धर्मी का होने का आरोप लगा दिया जाता है-
क्या सम्राट अशोक,ज्योती बा फुले या फिर डाॅ अंबेडकरजी, चीनी ,जापानी,बहुजन समाज वादी-नव बौद्धिष्टों के द्वारा उनकी अपनी मनगढंत व्याख्या के कारण उनका तथाकथित “बौद्ध-धर्म”स्वीकार करने मात्र से हमारे द्वारा त्याज्य हो गया ?
मैं जब महात्मा-बुद्ध के निर्वाणोपरान्त के इतिहास का अध्ययन करता हूँ तो देखता हूँ कि तद्कालीन अवसरवादी बौद्ध तथा सनातनी लोगों ने एक दूसरे पर अपना प्रभूत्व स्थापित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी ! जब बौद्धों को राज्याश्रय प्राप्त था ! तब
उन्होंने आज के आतंकवादियों की तरह से ही सनातनी लोगों को सताया ! मंदिरों को तोणा ! जबरन तलवार के बल पर बौद्ध बनाया ! और आद्य शंकराचार्यजी के द्वारा पुनः बौद्ध विद्वानों को शास्त्रार्थ द्वारा पराजित कर सनातन के जीर्णोद्धारोपरांत उनके ब्रम्हलीन होते ही उनके भी कुछेक भ्रष्ट अलगाववादी लोगों ने राज्याश्रय का लाभ लेते हुवे बौद्धों की हत्या की ! और स्तूपों को तोड़ा गया।
मित्रों ! एक गहेरी-खाई खोद दी गयी हमारे और उनके बीच ! इसका बिल्कुल नवीन उदारहण-“भिंडरावाले” का सेना द्वारा वध किये जाने के बाद और ईंदिरागाँधी की हत्या के बाद आपने देख ही लिया कि किस प्रकार तद्कालीन ईंदिरा के अंध समर्सथकों ने हमारे सिक्ख समाज पर इतने आतंक ढाये कि एक गहेरी खाई खोद दी। ये हमारा दुर्भाग्य है कि अंध समर्थन का विरोध करने वाले लोग ही आज -“अंध समर्थक” बन गये।
क्या देश-काल जन्य परीस्थियों के कारण कुछ आचार्यों के द्वारा या फिर इन्हीं मतों के कुछेक अवसरवादीयों के द्वारा-“जय भीम !खालिस्तान जिंदाबाद ! और जय रावण ! का नारा लगाने वाले भटके हुवे मतावलम्बियों के कारण एक दूसरे पर कीचड़ उछालने के कारण ये मत अर्थात विचारधारा त्याज्य हो गयी ?
क्या दो चार जैन मत के लोगों के-“गौ-माँस” के व्यापार में होने के कारण या एक दो जिनाचार्यों की सनातन के विरूद्ध विष-भरे प्रवचनों,या उन्हीं के कुछ घटिया पूर्वाचार्यों द्वारा सनातन की ! की हुयी निंदा के कारण पूरा का पूरा जैन समाज ही त्याज्य हो गया ?
क्या तथाकथित बौद्ध होने का दावा करने वाले कुछेक भिक्षुवों के नाम पर कलंक और पूर्व सम्राटों के उकसाने पर सनातन पर अत्याचार करने वाले कृतिम् बौद्धों के कारण- भगवान विष्णु के अवतार बुद्ध”-त्याज्य हो गये ?
क्या भिंडरावाले जैसे राष्ट्र द्रोहियों के कारण हम आप गुरू गोविंद सिंह और अंगद देव ही क्या पूरे सिक्ख समुदाय के उन बलिदानों को भूल सकते हैं,जो उन्होंने सनातन की रक्षा के लिये किया ?
मुझे भी जब मैं धम्मपद या आगमादि जैन गृंथों की व्याख्या प्रस्तुत करता हूँ तो बहूत से मेरे ही सनातनी भाई मुझपर बौद्ध या जैन होने का आरोप लगाते हैं ! और कुछेक बौद्ध तथा जैनी मुझपर सनातनी होने का आरोप मढ देते हैं। मित्रों ! सभी संत, विचार,मत,गृंथ इनकी–“अनेकता में एकता,हिंदू की विशेषता” हैं ! ये सभी संत,गृंथ,विचार,मत,सम्प्रदाय हमारे आपके हाथों की अंगुलियाँ है,इनके बिना मैं,आप और हमारे बिना ये सभी- “अधूरे” हैं।
इनके प्रति घृणित संदेश और इनके द्वारा हमारे प्रति घृणित  संदेश देने वाले कुछेक तथाकथित विद्वान और संत,समाज-सुधारक होने का ढोंग करने वाले लोग इनके और मेरे सभी के समाज में बैठे हुवे “जयचंदी-विचारधारा”के लोग हैं ! मैं आपका इस पद्द के उपसंहार में आज आह्वाहन करता हूँ कि,आप को यदि मेरे समन्वयात्मक एक सेतु का निर्माण करने वाले विचार श्रेष्ठ लगते हैं तो आओ हम सभी मिलकर-“एक ह्रिदय हो भारत जननी” के सूत्र का उद्घोष करें ! और अंत में मैं यह स्पष्ट रूप से स्वीकार करता हूँ कि कुछेक आतंकवादी समाज विरोधी धर्म और देश द्रोही कौमें मेरे देश में ही नहीं बल्कि उनके अपने देशों में भी फैली हुयी आज स्वयम् ही “भष्मासुर”की तरह अपना समूल उच्छेदन करने को तत्पर हैं ! और यह घृणित तथा समाज विध्वंसक-“फूट डालो और शाषन करो”की उनकी नीति को हम समझ कर उनके प्रति सदैव ही सचेत रहें ! यही इस पद्द का भाव है ! शेष अगले अंक में प्रस्तुत करता हूँ–“आनंद शास्त्री सिलचर, सचल दूरभाष यंत्र सम्पर्क सूत्रांक 6901375971”

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