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धम्मपद यमकवग्गो~१७ सूत्र- अंक~१७ — आनंद शास्त्री

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प्निय मित्रों ! नित्यसत्यचित्त बुद्धमुक्त पदऽस्थित तथागत महात्मा बुद्ध द्वारा उपदेशित धम्मपद के भावानुवाद अंतर्गत स्वकृत बाल प्रबोधिनी में यमकवग्गो के 18 वें पद्द का पुष्पानुवाद उनके ही श्री चरणों में निवेदित कर रहा हूँ—
“इध तप्पति पेच्च तप्पति पापकारी उभयत्ध तप्पति।
पापं मे कतं ति तप्पति भिय्यो तप्पति दुग्गतिं गतो।१७।।
इसे संस्कृत में कहते हैं कि–
तप्यतेऽत्र तथा प्रेत्य पापकार्युभयत्र च।
तप्यते स्वीयपापाय तप्यते निरये पुन:।।
भगवान अजातशत्रु जी पुनः कहते हैं कि-“इध तप्पति पेच्च तप्पति” मैं जैसा कि इसके पूर्व पद्य में कह चुका हूँ उसी को और भी स्पष्ट करता हूँ ! पाप कर्मों की स्मृति इतनी लज्जाजनक होती है कि मैं अपने द्वारा किये पापों को किसी के समक्ष कहने में तो हिचकिचाता हूँ,कि लोग क्या सोचेंगे,और यही मर्मांतक  घुटन मुझे भीतर तक तोड़ कर रख देती है।
मैं अपना स्वयम् का अनुभव आपको बताता हूँ,अनेकों बार यहीं चर्चाओं में यदि किसीने मेरे निबंध पर कोइ आपत्ति प्रकट की !या किसी ने कोई गलत बात लिखी,महिला,हिंदुत्व विरोधी,या फिर वर्णवादी टिप्पड़ी की तो मैं नाराज हो जाता हूँ ! उनसे तर्क-वितर्क करने लगता हूँ,उनसे वैमनश्यता रखने लगता हूँ,फिर कभी उनसे बात नहीं करना चाहता,यही पाप है ! और इसी की स्मृति मुझे हमेशा सालती रहती है।
तथागतजी का आशय है कि- “पापकारी उभयत्ध तप्पति”मैं अक्सर याद करता हूँ-मैंने अपने जीवनमें अनेकों पाप कर्म किये हैं,न जाने कितनों का दिल दुखाया हूँ, कितनों को अपशब्द कहा हूँ, कितनी ही बार अपने माता,पिता,दादा,दादी, भाई,पडोसियों ,मित्रों की अवहेलना किया हूँ,न जाने कितनी हिंसा किया हूँ !कभी किसी दुःखी की सहायता नहीं की,मुझे भलीभांति स्मरण है कि सन् २०१६ की एक घटना मुझे अभी भी भीतर से कँपकँपा देती है ! उन दिनो हम किराये के घर में द्वितीय तल पर रहते थे ! हमारे आवास में बाहर को खुलती एक बारादरी थी जहाँ बैठकर हमदोनों प्रातःकाल प्राणायाम करते थे ! एकदिन हम बैठे प्राणायाम कर रहे थे और मेरे समीप सामने की रेलिंग पर एक साधारण सा कीडा रेंग रहा था जिसे मैंने उन्माद स्वरूप ऊँगलियों से नीचे झटके से फेंक दिया ! बाद में बहुत ही पश्चाताप हुवा-“अहो मत्बहत्पापम्” इससे भी ऊपर न जाने कितनी स्त्रियों  के प्रति अंतःमन में गंदी भावनायें भी आयी होंगी,गरीबों के हिस्से का धन स्वयम् ही अर्जित कर लिया होऊँगा,सदैव ही कामोपभोगों की कल्पना में डूबा रहता हूँ, यह जानते हुवे भी कि संसार असार है किंतु फिर भी इसके मोह को नहीं छोड़ पाता।
और मित्रों ! यही पाप हैं जो मुझे जबतक मैं जीवित रहूँगा “पल-पल”मुझे सताते रहेंगे,भूँसे की आग की तरह जलाते रहेंगे ! और इसी हेतु भगवान् बुद्ध ने कहा हे कि-(1)- दुःख है ! (2)-दुःख का कारण भी है ! (3)- दुःख मिट सकता है !(4)-दुःख के मिटने का उपाय भी है।
मुझे आश्चर्य होता है विदुर के प्रति कहे हुवे दुर्योधन के वचन पर-
“जानामि धर्मम् न च मे प्रवृत्तिः,जानामि अधर्मः न च मे निवृत्तिः”
वो धर्म-अधर्म और उसके परिणाम को जानते समझते थे ! किन्तु जब उनके अनुसरण की बात आती थी तो वो अधर्मानुचरण करने लगे,राक्षसी प्रवृत्ति के वशीभूत हुवे वे युग-युगांतर तक अपयश के भागी बने ! मित्रों शिवभक्त दशकन्धर,चतुर्मुखी ब्रम्हा के परम भक्त हिरण्यकश्यपु,महिषासुर,हीरण्याक्ष,कुम्भ,निशुम्भ, रक्तबीज आदि हजारों ऐसे भक्त हुवे जिन्होंने-“भक्ति” पर ही कुठाराघात कर दिया। उन्होंने छणिक भोगोंपभोगों हेतु अपने समूचे अस्तित्व पर नकारात्मक अस्पृश्य छाया को सृष्टि पर्यन्त आच्छादित होने दिया।
मित्रों ! ये सर्व सामान्य अभिप्राय है कि हमलोग सामान्य मानव के इतर अपने आपको सभी लोग-“महामानव” मान बैठे हैं ! शास्त्र विहित सभी पापों को हम दूसरे द्वारा न करने की अपेक्षा करते हैं और अपने स्वयं को हम इन पापों को करने का पर्याप्त कारण ढूंढ लेते हैं जिससे इन पापों को करते हुवे भी अपने आपको निष्कलंक मानते हैं ! मैं यह कहना चाहता हूँ कि- “पापं मे कतं ति तप्पति” और जब मेरा अंतकाल आयेगा तो ये मेरी पापमयी स्मृतियाँ किन्हीं “प्रेतों” की तरह मेरे चित्त का आलोडन करती रहेंगी ! मथती रहेंगी वे मेरे चित्त को ! जब मैं बिस्तर पर पड़ा अंतिम साँसे ले रहा होऊँगा, जब मेरे अंगों में भयँकर पीड़ा हो रही होगी,अपने घृणित पापों के कारण जब मैं मल-मूत्र से लिथड़ा पडा करुण क्रंदन कर रहा होऊँगा, शरीर के नाना अंगों में न जाने कितनी नलिकायें पडी होंगी ! देहाध्यास होगा अथवा नहीं होगा ! अर्ध अथवा पूर्णतया मूर्छावस्था मुझमें होंगी ! जब मेरे परिजन नम आँखों से मेरी”अर्थी”सजा रहे होंगे ! तब मेरे यही पाप मुझे भयँकर यमदूतों की तरह मेरी मति का अपहरण कर लेंगे।
इस प्रकार यह स्पष्ट करते हैं कि-“भिय्यो तप्पति दुग्गतिं गतो”इस जन्मको तो मैं पाप करके पाप-चिंतन में दुःखी होते हुवे भोग ही लिया,और इन्हीं का स्मरण करता,जलता हुवा मरूँगा भी ! और “अंत मता सो गता” तथा-“प्रयाण काले मनसा चलेन” मरने के बाद भी वही “दुःस्मृतियाँ”मुझे और भी निम्नतम् घृणित नर्कों का भोग कराते हुवे और भी निर्कृष्ट योनिंयों में जन्म देंगे ! यही मुझ पापी,कामी-क्रोधी,लालची,मोहित बुद्धि और दुश्चरित्र की नियति है। शेष अगले अंक में !  -“आनंद शास्त्री सिलचर, सचल दूरभाष यंत्र सम्पर्क सूत्रांक 6901375971”

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