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मंगल पांडे जी की मूर्ति स्थापना एक अनसुलझी पहेली क्यूँ ? — आनंद शास्त्री

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मंगल पाण्डे जी की मूर्ति स्थापना हमारी मांग के निहितार्थ
सम्माननीय मित्रों ! भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महानायक, अग्रीम एवं प्रथम बलिदानी मंगल पाण्डे जी की स्मृति में अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुवे हमारे यशस्वी मुख्यमंत्री श्रीमान हेमन्तो बिस्वशर्मा जी,प्रधानमंत्री श्रीमान नरेन्द्र मोदी जी असम एवं भारत सरकार के साथ-साथ हमारी मातृसंस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्थानीय एवं राष्ट्रीय पदाधिकारी पूज्य गुरू तुल्य प्रचारकों से सविनय निवेदन करना चाहता हूँ कि स्वतंत्रता संग्राम के महानायकों में अग्रणी मंगल पाण्डे जी की मूर्ति सिल्चर नगर के मंगल पाण्डे चौक पर स्थापित करने की अनुमति प्रदान कर हम-आप अपने क्रान्तिकारी पूर्वजों के सम्मान हेतु एक और अच्छी पहल कर सकते हैं।
मैं भलीभांति समझता हूँ कि इस संदर्भ मे स्थानीय जन-समुदाय में धीरे-धीरे असंतोष गहराता जा रहा है ! उनकी मूर्ति स्थापित करने के विरूद्ध कोई भी नहीं है किन्तु फिर भी इतना विलम्ब ?
हम भारतीय जनता पार्टी के समर्थक थे ! हैं और आजीवन पर्यन्त रहेंगे भी ! हम जानते हैं कि अनुशासन ही सुशाशन एवं रामराज्य का आदर्श है ! और अनुशासन के विरूद्ध ! प्रशासन एवं सरकार के विरूद्ध ! हम किसका विरोध करेंगे ? क्या हम अपने मार्ग दर्शक,हममें हिन्दूत्व की विचारधारा का बीज आरोपित कर हिन्दुत्व की अस्मिता जागृत करने वाली हमारी मातृसंस्था अथवा राजनैतिक दल का विरोध कर सकते हैं ?
मेरे विचार से नहीं बिलकुल भी नहीं ! और अब तो बिलकुल भी नहीं क्योंकि मध्यप्रदेश,राजस्थान एवं छत्तीसगढ़ के चुनाव में मिली अभूतपूर्व सफलता के पश्चात सभी राजनैतिक विशेषज्ञों की आशा के विपरीत बिलकुल ही धरातलीय दल एवं हिन्दुत्व के लिये प्राण प्रण से समर्पित गली गली जाकर,ग्रामीण क्षेत्रों में में,नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में अपने प्राण हथेली पर रखकर जानेवाले कार्यकर्ताओं को अनायास मुख्यमंत्री पद देकर यह सिद्ध कर दिया है कि बीजेपी एवं हमारी मातृसंस्था के ह्रदय में राष्ट्रहित सर्वोपरि है।
मित्रों ! मैं बारम्बार आग्रह करता हूँ कि ये हमारे अपने स्वयं के परिवार की आवश्यक मांग परिवार के अभिभावक से है ! परिवार सरकार एवं प्रशासन सर्वोपरि है ! हम संघ एवं बीजेपी के कार्यकर्ता हैं ! हमारे आदर्श-“वीर सावरकर”हैं ! हम कालकोठरी में भी कोयलों से दिवारों पर लिखना जानते हैं कि-
“तेरा वैभव अमर रहे माँ हम दिन चार रहें न रहें”किन्तु हम किसका विरोध करेंगे ? हमारे विपक्ष में कौन हैं ? ये निश्चित है कि महाभारत की तरह मैं इसे धर्मयुद्ध की संज्ञा नहीं दे सकता ! हमारी इस मांग से किसी का इन्कार नहीं है,बस बात इतनी सी है कि हम समर्थन एकत्रित करने में अभी तक असमर्थ रहे।
स्थानीय जनता का अंतःकरण मंगल पाण्डे जी की मूर्ति स्थापित न होने से कुण्ठित होता जा रहा है ! व्यग्रता,मनोमालिन्यता वितृष्णा धीरे-धीरे स्वाभाविक रूप से स्वाभिमान पर लगती चोट के कारण क्रोधाग्निको भडका रही है ! और ऐसा होना किसी भी प्रकार से उचित नहीं है ! इसका उत्तरदायित्व दोनों पक्षों को जाता है ! हमारे राजनैतिक प्रतिनिधियों को भी गंभीरतापूर्वक अंतःकरण में झांक कर देखने की आवश्यकता है ! उनको भी आत्मविश्लेषण की आवश्यकता है ! वे बतायें कि-“मंगल पाण्डे चौक पर उनकी मूर्ति स्थापित करने की अनुमति क्यों नहीं मिली ?” मेरे निबंध का एक पक्ष यह भी है कि मंगल पाण्डे चौक पर पुरी तरह राष्ट्रीय राजमार्ग के बन जाने के उपरान्त भी इसकी साज सज्जा न होना ! मूर्ति स्थापित करने की अनुमति न मिलना ! अर्थात पर्दे के पीछे कोई न कोई स्थानीय षड्यंत्र यहाँ अवस्य चल रहा है ऐसा स्थानीय लोगों को प्रथम दृष्टया प्रतीत होता है।
हम सभी दुःखी इस लिये हैं कि चुनाव आते-जाते रहते हैं ! जय-पराजय भी एक सफल लोकतंत्रीय घटना है ! किन्तु जब राजनैतिक व्यवस्था किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाती, सामाजिक,राजनैतिक-आर्थिक अथवा की जनसाधारण की आवाज से मुँह मोड़ कर आने वाले कल के नेतृत्व पर आज की समस्या छोड़ देती है तो यहीं से दुर्भाग्य का प्रारम्भ हो जाता है !ये निश्चित है कि अपने स्वयं के द्वारा चुनी हुई सरकार के विरूद्ध जाना एवं ऐसी सरकार का अपने समर्थकों के विरूद्ध जाना यह दोनों ही ह्रदय विदारक परिस्थितियाँ होंगी और ये निश्चित है कि इस व्यर्थ के विरोध में विजयी सरकार ही होगी ! किन्तु ये यक्ष-प्रश्न तब उनकी आत्मा को भी सतायेगा कि इस विजय से उनको जो पराजय मिली वह कलिंग युद्ध में सम्राट अशोक की वही विजय थी जिसके कारण बौद्ध धर्म को स्वीकार कर अशोक ने भारतीय संस्कृति को सदियों-सदियों के लिये मुस्लिमों और आंग्लों का गुलाम बना दिया।
मित्रों ! ये हम सभी का ! अर्थात हमारी राज्य सरकार ! यह बराक उपत्यका ! हमारे बंगबन्धु ! यह हिन्दी भाषी समुदाय तथा जनप्रतिनिधि ! सभी का समग्र दुर्भाग्योदय है कि हम सभी में धीरे-धीरे ऐसी दरारें ! मनोमालिन्यता बढती जा रही है ! मैं मानता हूँ कि जानबूझकर मनभेद बढाया जा रहा है जिसका परिणाम हमारी पीढियों भुगतने को अभिशप्त होंगी ! ब्रम्हपूत्र वेली के विकास एवं असम के विकास के साथ-साथ बराक उपत्यका की भी समसामयिक सामाजिक समस्याओं पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है ! मुझे अब केवल अपने राजनैतिक प्रतिनिधि श्रीमान कौशिक राय जी एवं यशस्वी मुख्यमंत्री श्रीमान हेमन्तो बिस्वशर्मा जी से ही यह अपेक्षा शेष बची है कि वे चाहें तो हमारी स्वांसों को अवरुद्ध कर देने वाली ! जन आस्था की अनदेखी करने वाली भावनाओं को ज्वालामुखी बनकर अपनी स्वयं की अर्थात हमारी अंत्येष्टि के पथ पर चलने से रोक सकते हैं ! मैं जानता हूँ कि स्थानीय समाज में आक्रोश तीव्रता से पनप रहा है ! और ये भी निश्चित है कि जन आक्रोश को प्रशासन सुगमता से दबाने में भलीभांति समर्थ और सक्षम है किन्तु यह भी एक ऐसी उलझी हुयी गांठ होगी जिसे समय का शीतललेप भी सुलझाने में सक्षम नहीं होगा ! मंगल पाण्डे जी की हत्या अंग्रेजी हुकूमत ने नहीं अपितु हमारे अपने उन लोगों ने करायी थी जो उनके अपने साथी थे ! और इससे उठी चिन्गारी ने अंततः भारत की स्वतंत्रता के नाम पर माँ भारती के तीन टुकड़े कर दिये
..आनंद शास्त्री सिलचर, सचल दूरभाष यंत्र सम्पर्कांक 6901375971″

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