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मनके सुगना कुछ बोलत बा

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हरदम बेचैनी उलझन में,
पलपल जीवनके चिंतनमें,
चंदा, सूरज, जुगनू  तारा,
धरती अंबर सब डोलत बा,
मनके सुगना कुछ बोलत बा।
***
लागल बावे आना-जाना,
दुनिया लागेला बेगाना,
सब आइल गइल जोड़ेला,
अब बैरागी भी मोलत बा,
मनके सुगना कुछ बोलत बा।
***
आकुल, व्याकुल बा दीवाना,
का लेअइनी  का लेजाना,
हरदम भटकी मारा मारा,
तन हारल जीवन तोलत बा
मनके सुगना कुछ बोलत बा।
***
दुनिया लागेला नजराना,
मनभावन हर तानाबाना,
भीतर काहे बा द्वंद छिड़ल,
जीवनके गठरी खोलत बा,
मनके सुगना कुछ बोलत बा।
***
तरसत बावे काहें जीवन,
सूना काहें मनके मधुबन,
तनमन सिहरे बा तेज हवा,
भय तनमन में अब घोलत बा
मनके सुगना कुछ बोलत बा।
***
दिनरात व्यर्थ लागल गपना,
भाउक मनमें लाखों सपना,
पाया खोया के बा रटना,
काया माया हिचकोलत बा।
मनके सुगना कुछ बोलत बा।
***
गजबे जगके बा संरचना
दुनिया सारा बोले अपना,
मतलब से नाता जोड़ेला,
बेबाते रोज टटोलत बा,
मनके सुगना कुछ बोलत बा।
 – अनिरुद्ध कुमार सिंह, (धनबाद, झारखंड)

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