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मुल्क चलो आंदोलन 1921 के वीर शहीदों के प्रति श्रद्धांजलि

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अंग्रेजी शासन का एक

इतिहास आज सुनाता हूं।

अमर शहीदों की बलिदानी

गाथा पंचो गाता हूं।

नयन नयन में आंसू था तब,

भूखे पेट गरीबों की

गिरमिट के बंधन में जकड़े

अंग्रेजी हुकूमत की।

आश नहीं कोई बास नहीं था

चाय बागान मजदूरों की।

देव शरण त्रिपाठी का

मजबूत विशाल ललकारा था 

घर वापस अब लौट चलें सब 

गंगा दयाल का नारा था

राधा कृष्ण के सफल चाल ने 

चरगोला को गोल किया

नहीं मानेंगे शासन बर्बर

अंग्रेजों को बोल दिया ।

चल पड़े हजारों श्रमिक 

बांध कफन लीलारों पर

आर्थिक बिजली गिर पड़ी थी 

अंग्रेजी मक्कारों पर

1921 का पद्मा नदी हमारी साक्षी है 

वीर शहीदों की लाशों की वही समेटे राखी है

अंग्रेजों की बंदूके निर्मम 

चल पड़ी मजदूरों पर

गांधी बाबा की जय कारा

गूंज रही क्षितिजों पर

नहीं भूलेंगे बलिदान हम

देव शरण त्रिपाठी कि

जोरहाट के जेल में जिसने 

अनशन कर तन त्याग दिया 

भारत मां का एक सेवक 

अंग्रेजी को नक्कार दिया।

नहीं भूलेंगे बलिदान 

हजारों वीर शहीदों कि

कविता के हर शब्द सुमन 

श्रद्धा है वीर सपूतों की।

-चंदन त्रिपाठी

लालछोरा चाय बागान

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