श्रद्धांजलि लेख कठिन से कठिन परिस्थितियों का हंसते-२ सामना करने वाले मेरे मामा गणेश प्रसादजी का यूं चले जाना – दिलीप कुमार

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कठिन से कठिन परिस्थितियों का हंसते-२ सामना करने वाले मेरे मामा गणेश प्रसादजी का यूं चले जाना - दिलीप कुमार

किसी ने सही ही कहा है, चैंपियन पैदा नहीं होते, अपने परिश्रम और लगन से बनते हैं। ऐसे ही एक चैंपियन यूपी के छोटे से गाव में पले बढ़े, फरीदाबाद, हरियाणा निवासी मेरे मझले मामा श्री गणेश प्रसादजी थे। 2020 फरवरी को ही उन्होंने एमटीएनएल दिल्ली में डीजीएम के पद से बीआरएस लिया था। कोरोना महामारी के चलते पिछले 24 मई को उनका असामयिक निधन हो गया। वे अपने पीछे धर्मपत्नी श्रीमती रेणु गुप्ता, पुत्र निखिल, पुत्र वधू अंजलि, दो पुत्रियां भावना और एकता सहित भरा पूरा परिवार छोड़ गए हैं।

उनके जीवन की शुरुआत 01-07-1962 से हुई और सफर उतार- चढ़ाव से भरा रहा। उनके पिता स्व. गौरी शंकर प्रसाद और मां श्रीमती पार्वती देवी थी। उनका जन्म स्थान खरसरा, बलिया, उत्तरप्रदेश था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा गांव में ही हुई। हाई स्कूल और इंटरमीडिएट – रतसड़ से (खरसरा से 8 किलोमीटर, प्रतिदिन साइकिल से)
बलिया से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा (साइकिल पर खरसरा से 22 किलोमीटर) उन्हें पढने का बचपन से बहुत शौक था। दिया के नीच रात के 2-3 बजे तक पढ़ते थे। अपने शिक्षकों के पसंदीदा छात्र थे। उन्हें आगे बढ़ने के लिए उनकी दीदी स्व. चंद्रावती देवी तथा बड़े भाई शिवप्रसाद जी हमेशा प्रेरित उत्साहित करते रहते थे। पढाई के समय उनके पिता की जल्दी निधन हो जाने के बाद घर की सभी जिम्मेदारियों के साथ में अपनी पढाई भी पूरी की।
30 जून 1982 में शादी के बाद जाब की तालाश में अकेले दिल्ली चले गए। पहले कालकाजी में किराए के घर में फिर संगम बिहार में अपना घर, वर्तमान फरीदाबाद के फ्लैट में परिवार सहित रहते थे।

शादी के बाद दिल्ली अकेले गए ताकि उनकी पत्नी स्नातक कर सकें। एक साल बाद उनकी पत्नी कालकाजी दिल्ली में उनके साथ रहने आई थीं। उनको लिखने का बहुत शौक था और उनकी एक डायरी भी है परिवार के पास। उसके बाद उन्होंने अपनी पत्नी को बी.एड करने के लिए एमडीयू, रोहतक में एडमिशन करवा दिया। उन्हे पता था की शिक्षा ही उन्हें आगे ले जा सकती है। उसके बाद उन्होंने अपनी पत्नी को प्रेरित किया एक प्राथमिक शिक्षक के रूप में काम करने के लिए और उन्होंने 1990 से ले कर 2013 (23 वर्ष) तक शिक्षण कार्य किया। अपने तीनों बच्चों को भी अच्छी तरह पढ़ाया-लिखाया इंजीनियर बनाया।

उनकी खुशी हमेशा अपने परिवार, भगवान और सामाजिक कार्यों में रहती थी। उन्होंने हमेशा सभी को स्वतंत्र बनने और मूल्यों और सिद्धांतों का जीवन जीने के लिए निर्देशित किया। वह निस्वार्थ, अनुशासित, केंद्रित, देने वाला और दूसरों के लिए बहुत मददगार था। परिवार के लिए वह  हीरो थे और हमेशा हीरो रहेंगे। वे चरित्रवान और सरल स्वभाव के व्यक्ति थे। कोई बुरी आदत नहीं थी। रोजाना व्यायाम से खुद को फिट रखना, उनका स्वाभाविक जीवन जीने का तरीका था।

उनका पुरा जीवन बहुत प्रेरक और उत्साहजनक रहा। वो काफ़ी अच्छे लेखक भी थे, उनने खुद से काफ़ी कविताये लिखी हैं, अपनी धर्मपत्नी के लिए। उन्हे हारमोनियम बजने का शौक था और मुश्किल दिनो में रामायण का पाठ करते रहे… नियम से प्रतिदिन। सेवानिवृत्ति के बाद एक साल अपने पूरे परिवार के साथ समय बिताया। उनके आखिरी कठिन पलों में उनका परिवार हर पल, उनके साथ रहा। वे फाइटर थे, आखरी पल तक चेहरे पे हंसी और दिल में हौसला था।

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